बिहार में संजय निषाद के खिलाफ गूंजे मुर्दाबाद के नारे
- बिहार की राजनीति में हाल ही में एक बड़ी हलचल देखने को मिली।
- यह हलचल तब हुई जब संजय निषाद के खिलाफ बिहार के निषाद समाज ने विरोध जताया।
- विरोध का स्वर इतना तेज़ था कि भीड़ ने खुले तौर पर “संजय निषाद मुर्दाबाद” के नारे लगाए।
- यह नारेबाज़ी बिहार की राजनीति में लंबे समय तक गूंजने वाली है।
- संजय निषाद उत्तर प्रदेश के जाने-माने नेता हैं।
- वे निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं।
- उत्तर प्रदेश में उनका एक बड़ा राजनीतिक कद है।
- लेकिन बिहार में उनकी छवि अब सवालों के घेरे में आ गई है।
- बिहार के निषाद समाज ने साफ शब्दों में अपना असंतोष व्यक्त किया।
- उनका आरोप है कि संजय निषाद ने समाज के भरोसे के साथ छल किया है।
- पहले वह समाज के उत्थान की बातें करते थे।
- लेकिन अब वह केवल राजनीतिक स्वार्थ में लगे हुए हैं।
- बिहार के निषादों ने कहा कि उन्हें केवल इस्तेमाल किया गया।
- चुनावी मंच पर बड़ी-बड़ी बातें की गईं।
- मगर जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं बदला।
- यही कारण है कि समाज ने खुलकर विरोध किया।
- विरोध का यह स्वर अब केवल स्थानीय नहीं रहा।
- यह विरोध धीरे-धीरे राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनता जा रहा है।
- खासकर बिहार की राजनीति में यह बड़ा मुद्दा बन चुका है।
- मुर्दाबाद के नारे किसी सामान्य असहमति के संकेत नहीं हैं।
- यह गहरी नाराज़गी का प्रतीक हैं।
- नाराज़गी का यह स्वर समाज की आंतरिक पीड़ा को दर्शाता है।
- निषाद समाज वर्षों से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है।
- समाज की अपेक्षा थी कि संजय निषाद उनकी आवाज़ बनेंगे।
- लेकिन बिहार के लोगों को लगता है कि ऐसा नहीं हुआ।
- उनके अनुसार संजय निषाद केवल सत्ता और पद की राजनीति करते रहे।
- समाज की वास्तविक समस्याओं को उन्होंने नज़रअंदाज़ कर दिया।
- शिक्षा, रोजगार और आरक्षण जैसे मुद्दे अनसुलझे रहे।
- मछुआरा समुदाय की स्थिति अब भी दयनीय है।
- सरकारों ने केवल आश्वासन दिया।
- आश्वासन और हकीकत में ज़मीन-आसमान का फर्क है।
- इसी वजह से समाज का धैर्य टूट गया।
- बिहार के विभिन्न जिलों में विरोध प्रदर्शन हुए।
- भीड़ में युवा वर्ग सबसे आगे रहा।
- युवाओं ने जमकर नारेबाज़ी की।
- उनके हाथों में पोस्टर और तख्तियां भी थीं।
- इन पोस्टरों पर लिखा था – “संजय निषाद इस्तीफ़ा दो”।
- यह नारे उनके प्रति गुस्से को साफ दर्शाते हैं।
- गुस्से का कारण केवल राजनीति नहीं है।
- यह गुस्सा समाज की उपेक्षा से उपजा है।
- संजय निषाद ने खुद को समाज का बड़ा नेता बताया।
- लेकिन व्यवहार में उनकी प्राथमिकता अलग रही।
- बिहार के निषादों का कहना है कि उनके साथ धोखा हुआ।
- उन्हें राजनीति में केवल वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया गया।
- चुनाव खत्म होते ही उनकी समस्याएं भुला दी जाती हैं।
- यही कारण है कि अब समाज ने आवाज़ बुलंद की है।
- इस आवाज़ ने राजनीति के गलियारों में हलचल मचा दी।
- राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विरोध बहुत गंभीर है।
- क्योंकि यह विरोध केवल एक नेता के खिलाफ नहीं है।
- यह विरोध पूरे राजनीतिक ढांचे के खिलाफ है।