विषय : मंदिर और मदिरा
भाग 1 – प्रस्तावना
- मानव जीवन दो पहियों पर चलता है – स्त्री और पुरुष।
- परिवार की गाड़ी तभी संतुलित चलती है जब दोनों पहिए सही दिशा में हों।
- यदि एक पहिया मंदिर की ओर जाए और दूसरा मदिरा की ओर, तो असंतुलन तय है।
- मंदिर आस्था, भक्ति, अनुशासन और नैतिकता का प्रतीक है।
- मदिरा मोह, व्यसन, आलस्य और विनाश का प्रतीक है।
- जब स्त्री मंदिर की भक्ति में डूब जाती है और पुरुष मदिरा के नशे में, तब घर का तालमेल टूट जाता है।
- एक ओर पूजा की थाली, दूसरी ओर शराब की बोतल – यह विरोधाभास परिवार का संतुलन बिगाड़ देता है।
- समाज ने हमेशा संतुलित जीवन को आदर्श माना है।
- परंतु जब नशा चरम पर हो जाए तो कोई भी घर बर्बादी से नहीं बच सकता।
- इसी सच्चाई को यह वाक्य प्रकट करता है – “जिस घर की औरत को मंदिर का नशा हो और आदमी को मदिरा का नशा हो, उस घर को सर्वनाश होने से कोई रोक नहीं सकता।”
भाग 2 – स्त्री और मंदिर का लगाव
- भारतीय संस्कृति में स्त्री को घर की लक्ष्मी कहा गया है।
- स्त्री का झुकाव धार्मिकता और आध्यात्मिकता की ओर स्वाभाविक माना जाता है।
- सुबह-सुबह मंदिर की घंटियां और आरती की ध्वनि स्त्री के जीवन में ऊर्जा भरती है।
- कई घरों में स्त्रियाँ पूजा-पाठ, व्रत-उपवास और भजन-कीर्तन में समय बिताती हैं।
- मंदिर स्त्री को शांति, आत्मबल और सहारा देता है।
- यह लगाव तब तक शुभ होता है जब तक वह संतुलित हो।
- लेकिन जब यही लगाव “नशा” बन जाए, तो समस्या खड़ी हो जाती है।
- नशा यानी इतना गहरा मोह कि बाकी जिम्मेदारियाँ पीछे छूट जाएँ।
- यदि स्त्री दिन-रात मंदिर और भक्ति में ही डूबी रहे तो घर की देखभाल प्रभावित होती है।
- बच्चों की शिक्षा, घर का खाना, रिश्तों की मर्यादा – सब उपेक्षित होने लगते हैं।
- भक्ति तभी कल्याणकारी है जब जीवन के अन्य कर्तव्यों के साथ संतुलन रखे।
- स्त्री यदि मंदिर की ओर पूरी तरह झुक जाए तो घर की नींव कमजोर होने लगती है।
- क्योंकि घर को चलाने में स्त्री की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- धर्म का पालन करना आवश्यक है, पर अति हर जगह हानिकारक होती है।
- संतुलित भक्ति घर को स्वर्ग बना सकती है।
- पर अति-भक्ति घर को नरक भी बना सकती है।
- मंदिर स्त्री के लिए शक्ति का स्रोत है, लेकिन अगर वही नशा बन जाए तो परिवार को उससे कोई लाभ नहीं मिलता।
- भक्ति में खोई हुई स्त्री कई बार अपने पति और बच्चों की समस्याओं को नजरअंदाज करने लगती है।
- मंदिर का मोह इतना गहरा हो सकता है कि स्त्री की प्राथमिकताएँ ही बदल जाएँ।
- जब घर की स्त्री का ध्यान परिवार से हटकर केवल मंदिर की ओर हो, तो घर का संतुलन डगमगाने लगता है।