गोरखपुर। जेल की ऊंची दीवारों और सलाखों के पीछे भी जिंदगी को नई दिशा देने की कोशिश जारी है। गोरखपुर जिला कारागार की महिला बैरक में शिक्षा और हुनर के माध्यम से बदलाव की एक प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है। यहां कुछ महिला बंदियां खुद दूसरी महिलाओं को पढ़ा रही हैं, तो कुछ ब्यूटीशियन और सिलाई-कढ़ाई जैसे रोजगारपरक प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनने का रास्ता दिखा रही हैं।
इस पहल की खास बात यह है कि कभी अपने मामलों को लेकर चर्चा में रहीं कुछ महिला बंदियां अब जेल के भीतर दूसरी महिलाओं के लिए सीखने और आगे बढ़ने का माध्यम बन रही हैं। जेल प्रशासन विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से यह प्रयास कर रहा है, ताकि रिहाई के बाद महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।
पीएचडी धारक गरिमा सिंह पढ़ा रहीं महिला बंदियों और बच्चों को
गोरखपुर जिला जेल में बंद गरिमा सिंह पढ़ाई-लिखाई के क्षेत्र में दूसरी महिला बंदियों की मदद कर रही हैं। उनके पास पीएचडी की शैक्षणिक योग्यता है। वह महिला बैरक में बंद महिलाओं और उनके साथ रह रहे बच्चों को पढ़ाने में सहयोग कर रही हैं।
इससे उन महिलाओं को शिक्षा हासिल करने का अवसर मिल रहा है, जिन्हें जेल में रहते हुए पढ़ाई जारी रखने में कठिनाई होती है। बच्चों के लिए भी यह पहल उपयोगी साबित हो रही है।
अंशिका सिंह दे रहीं ब्यूटीशियन का प्रशिक्षण
महिला बैरक में अंशिका सिंह दूसरी बंदियों को ब्यूटीशियन का प्रशिक्षण दे रही हैं। बताया गया है कि उन्हें इस काम का अच्छा अनुभव है और वह अपने हुनर के माध्यम से दूसरी महिलाओं को प्रशिक्षण दे रही हैं।
रोटरी क्लब यूथोरिया के सहयोग से ब्यूटीशियन कोर्स संचालित किया जा रहा है। प्रशिक्षण में महिलाओं को सौंदर्य संबंधी कार्यों और ब्यूटी पार्लर से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी दी जा रही है।
इस प्रशिक्षण का उद्देश्य महिलाओं को ऐसा हुनर देना है, जिसके सहारे वे जेल से बाहर आने के बाद रोजगार हासिल कर सकें या अपनी परिस्थितियों के अनुसार स्वरोजगार शुरू कर सकें।
शालिनी श्रीवास्तव दे रहीं सरकारी योजनाओं की जानकारी
देवरिया की निलंबित बीएसए शालिनी श्रीवास्तव भी महिला बैरक में दूसरी बंदियों की मदद कर रही हैं। वह महिलाओं को विभिन्न सरकारी योजनाओं और उनसे मिलने वाले लाभों की जानकारी देती हैं।
उनकी पढ़ने-लिखने में रुचि का उपयोग दूसरी महिलाओं को जानकारी देने में हो रहा है। सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता से महिला बंदियों को जेल से बाहर निकलने के बाद उपलब्ध सुविधाओं और अवसरों को समझने में मदद मिल सकती है।
सिलाई-कढ़ाई सीखकर आत्मनिर्भर बनने की तैयारी
जिला जेल में महिला बंदियों को केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। एसीएम सहयोगी संस्था के माध्यम से सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण कराया जा रहा है।
प्रशिक्षण लेने वाली कुछ महिलाएं अब दूसरी बंदियों के कपड़े सिलने में भी सहयोग कर रही हैं। इस तरह जेल के भीतर ही सीखे गए हुनर का व्यावहारिक इस्तेमाल हो रहा है।
जेल प्रशासन का प्रयास है कि महिलाओं को ऐसे कौशल सिखाए जाएं, जिनकी मदद से वे भविष्य में रोजगार के अवसर तलाश सकें।
जेल में 73 महिला बंदियों के साथ रह रहे छह बच्चे
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गोरखपुर जिला जेल में इस समय 73 महिला बंदी हैं।
इनके साथ छह बच्चे भी रह रहे हैं। इनमें से दो बच्चे सेंट एंथोनी स्कूल में पढ़ने जाते हैं।
महिला बंदियों के लिए शिक्षा और प्रशिक्षण की व्यवस्था के साथ बच्चों की पढ़ाई और उनके विकास पर भी
ध्यान दिया जा रहा है। जेल परिसर में सकारात्मक वातावरण तैयार करने की कोशिश की जा रही है।
त्योहारों पर महिला बैरक में दिखती है पारिवारिक एकता
महिला बैरक में बंदियों के बीच आपसी तालमेल भी देखने को मिलता है।
तीज, होली, दीपावली और करवाचौथ जैसे त्योहार महिलाएं
मिल-जुलकर मनाती हैं। महिला बंदी रक्षक भी इन आयोजनों में शामिल होती हैं।
त्योहारों के अवसर पर बैरक का माहौल परिवार जैसा हो जाता है।
ऐसी गतिविधियां महिलाओं को मानसिक रूप से सकारात्मक बनाए रखने और
आपसी सहयोग की भावना विकसित करने में मदद करती हैं।
जेल अधीक्षक ने बताया आत्मनिर्भर बनाने का उद्देश्य
जेल अधीक्षक डीके पांडेय के अनुसार, महिला बंदियों को रिहाई के बाद आत्मनिर्भर बनाने के लिए
विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से ब्यूटीशियन और सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण दिलाया जा रहा है।
उनका उद्देश्य है कि पढ़ाई, कौशल प्रशिक्षण और रचनात्मक गतिविधियों के
माध्यम से महिलाओं को सकारात्मक वातावरण मिले और
वे जेल से बाहर निकलने के बाद अपने जीवन को नए सिरे से व्यवस्थित कर सकें।
जेल में सुधार और पुनर्वास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
जेल में शिक्षा और रोजगारपरक प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल समय बिताना नहीं,
बल्कि बंदियों को भविष्य के लिए तैयार करना है। उत्तर प्रदेश कारागार
प्रशासन की नागरिक अधिकार संबंधी जानकारी में भी बंदियों की साक्षरता,
पुस्तकालय और व्यावसायिक प्रशिक्षण जैसी सुविधाओं का उल्लेख है।
गोरखपुर जिला जेल में चल रही यह पहल इसी सोच को आगे बढ़ाती है कि
बंदियों को सजा के साथ सुधार और पुनर्वास के अवसर भी मिलने चाहिए।
निष्कर्ष
गोरखपुर जिला जेल की महिला बैरक में शिक्षा, प्रशिक्षण और
आपसी सहयोग के माध्यम से बदलाव की कोशिश की जा रही है। कोई महिला दूसरी बंदियों को पढ़ा रही है, तो
कोई ब्यूटीशियन और सिलाई-कढ़ाई का हुनर सिखा रही है।
यह पहल रिहाई के बाद रोजगार और आत्मनिर्भरता की दिशा में मददगार बन सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. गोरखपुर जिला जेल में महिला बंदियों के लिए क्या व्यवस्था की गई है?
महिला बंदियों को पढ़ाई, ब्यूटीशियन और सिलाई-कढ़ाई जैसे प्रशिक्षण उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
2. महिला बंदियों को ब्यूटीशियन प्रशिक्षण कौन दे रहा है?
जेल में बंद अंशिका सिंह अपने अनुभव के आधार पर दूसरी महिला बंदियों को ब्यूटीशियन का प्रशिक्षण दे रही हैं।
3. महिला बंदियों को पढ़ाने में कौन सहयोग कर रही हैं?
पीएचडी धारक गरिमा सिंह महिला बंदियों और उनके साथ रह रहे बच्चों को पढ़ाने में सहयोग कर रही हैं।
4. गोरखपुर जिला जेल में कितनी महिला बंदी हैं?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार जेल में 73 महिला बंदियां हैं और उनके साथ छह बच्चे भी रह रहे हैं।
5. प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य क्या है?
महिलाओं को रिहाई के बाद रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने,
आत्मनिर्भर बनाने और समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में मदद करना।
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