धुरियापार मेले में जला रावण का पुतला, गंगा-जमुनी तहजीब और भाईचारे की दिखी मिसाल

राकेश शर्मा की रिपोर्ट

धुरियापार, गोरखपुर | 23 अक्टूबर 2026

गोरखपुर के धुरियापार में विजयदशमी के तीसरे दिन आयोजित ऐतिहासिक मेले का समापन रावण दहन के साथ हुआ। पुतले में आग लगते ही पूरा मैदान जय श्री राम के उद्घोष से गूंज उठा। मेले में बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। यहां हिंदू-मुस्लिम समुदाय की भागीदारी ने आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द की मिसाल पेश की।

धुरियापार मेले में धूमधाम से हुआ रावण दहन, जय श्री राम के लगे जयकारे

गोरखपुर। बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक विजयदशमी पर्व के अवसर पर गोरखपुर जिले के धुरियापार में आयोजित ऐतिहासिक मेले का समापन रावण दहन के साथ हुआ। रावण के पुतले में आग लगते ही वह धू-धू कर जल उठा। इस दौरान मेले में मौजूद हजारों लोगों ने जय श्री राम के गगनभेदी उद्घोष और आतिशबाजी के बीच इस पल का स्वागत किया। पूरे क्षेत्र में उत्सव का माहौल रहा और लोगों ने मेले का आनंद लिया।

धुरियापार मेले की 50 साल से अधिक पुरानी परंपरा

धुरियापार में विजयदशमी के तीसरे दिन द्वादशी तिथि को मेले के आयोजन की परंपरा चली आ रही है। स्थानीय स्तर पर इस मेले का इतिहास 50 वर्षों से भी अधिक पुराना बताया जाता है। वर्षों से आयोजित हो रहा यह मेला क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। मेले के आयोजन को लेकर स्थानीय लोगों में खासा उत्साह रहता है। बाहर रहने वाले लोग भी इस अवसर पर अपने घर लौटते हैं, ताकि परिवार और परिचितों के साथ मेले का आनंद ले सकें।

धुरियापार-उरुवा मुख्य मार्ग पर आयोजित होने वाले इस मेले में राम और रावण की सेनाओं के बीच युद्ध का सजीव मंचन आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहता है। लोग खरीदारी करने के साथ-साथ रामलीला के इस पारंपरिक मंचन को भी देखते हैं। रावण दहन के दौरान जुटने वाली भीड़ मेले के उत्साह को और बढ़ा देती है।

हिंदू-मुस्लिम एकता और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल

धुरियापार के मेले की विशेषता केवल धार्मिक आयोजन और रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक सौहार्द और आपसी भाईचारे का भी प्रतीक है। मेले में हिंदू परिवारों के महिला, पुरुष और बच्चे बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। इसी तरह मुस्लिम समुदाय के लोग भी पूरे उत्साह के साथ मेले में शामिल होकर खरीदारी और मनोरंजन करते हैं।

दोनों समुदायों की सहभागिता इस आयोजन को खास बनाती है। मेले के दौरान लोगों का एक साथ जुटना क्षेत्र की गंगा-जमुनी तहजीब की झलक प्रस्तुत करता है। स्थानीय लोगों के लिए यह मेला केवल मनोरंजन का अवसर नहीं, बल्कि अपनी पुरानी परंपराओं और आपसी रिश्तों को मजबूत करने का भी माध्यम है।

यही वजह है कि धुरियापार के इस मेले का इंतजार क्षेत्र के लोगों को पूरे साल रहता है। रोजगार और अन्य कारणों से बाहर रहने वाले लोग भी मेले के समय घर आने का प्रयास करते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े हुए है।

शुरुआत में यातायात व्यवस्था प्रभावित, बाद में संभली स्थिति

धुरियापार-उरुवा मुख्य मार्ग पर मेले का आयोजन होने के कारण यातायात व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण रहता है। वाहनों की आवाजाही बाधित न हो, इसके लिए मुख्य मार्ग को गांव के दूसरे वैकल्पिक रास्ते से डायवर्ट करने की व्यवस्था की जाती है।

इस वर्ष मेले की शुरुआत में लगभग एक घंटे तक कमेटी और प्रशासन की कमजोर व्यवस्था के चलते मार्ग डायवर्जन समय से लागू नहीं हो पाया। इसके कारण कुछ समय तक वाहन मेले के बीच से गुजरते रहे और वहां अफरा-तफरी जैसी स्थिति बन गई। इससे मेले में आए लोगों को असुविधा का सामना करना पड़ा।

स्थानीय लोगों की शिकायत के बाद प्रशासन सक्रिय हुआ।

इसके बाद रस्सी लगाकर वाहनों की आवाजाही को वैकल्पिक मार्ग की ओर मोड़ा गया।

यातायात व्यवस्था सुधरने के बाद स्थिति सामान्य हो गई।

इसके बाद भारी भीड़ के बावजूद लोगों ने अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण तरीके से मेले का आनंद लिया।

इस घटना से स्पष्ट होता है कि ऐसे बड़े आयोजनों में यातायात डायवर्जन की व्यवस्था समय से लागू करना जरूरी है। यदि पहले से पर्याप्त इंतजाम किए जाएं, तो श्रद्धालुओं और मेले में आने वाले परिवारों को परेशानी से बचाया जा सकता है।

परंपरा, संस्कृति और भाईचारे का संगम बना मेला

धुरियापार का ऐतिहासिक मेला धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और सामाजिक एकता का संगम है।

रावण दहन के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया गया।

वहीं, विभिन्न समुदायों के लोगों की भागीदारी ने आपसी सद्भाव का महत्व भी उजागर किया।

मेले के दौरान यातायात व्यवस्था में शुरुआती परेशानी जरूर सामने आई, लेकिन बाद में स्थिति संभलने से आयोजन आगे बढ़ सका।

स्थानीय लोगों के लिए यह मेला क्षेत्र की पहचान और सामूहिक उत्सव का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

Facts/Details

  • आयोजन स्थल: धुरियापार, गोरखपुर।
  • आयोजन का अवसर: विजयदशमी के तीसरे दिन द्वादशी तिथि।
  • प्रमुख आकर्षण: रावण दहन, राम-रावण युद्ध का सजीव मंचन और आतिशबाजी।
  • परंपरा: स्थानीय स्तर पर 50 वर्षों से अधिक पुराना मेला।
  • विशेषता: हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोगों की सहभागिता।
  • यातायात व्यवस्था: शुरुआत में देरी के बाद वाहनों को वैकल्पिक रास्ते से डायवर्ट किया गया।

Statement

धुरियापार का ऐतिहासिक मेला क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक है।

रावण दहन के दौरान उमड़ी भीड़ और दोनों समुदायों के लोगों की सहभागिता ने आयोजन को खास बनाया।

हालांकि, शुरुआत में यातायात डायवर्जन में देरी के कारण कुछ समय तक परेशानी हुई।

बाद में व्यवस्था संभाल ली गई। भविष्य में ऐसे आयोजनों के दौरान यातायात प्रबंधन और सुरक्षा के इंतजाम।

पहले से सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि लोगों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

Q1. धुरियापार का ऐतिहासिक मेला कहां आयोजित हुआ?

धुरियापार, गोरखपुर में धुरियापार-उरुवा मुख्य मार्ग पर मेले का आयोजन हुआ।

Q2. धुरियापार मेले का प्रमुख आकर्षण क्या रहा?

रावण दहन, राम-रावण युद्ध का सजीव मंचन, आतिशबाजी और जय श्री राम के उद्घोष प्रमुख आकर्षण रहे।

Q3. धुरियापार मेले की परंपरा कितनी पुरानी है?

स्थानीय जानकारी के अनुसार, इस मेले की परंपरा 50 वर्षों से भी अधिक पुरानी है।

Q4. धुरियापार मेले की सबसे खास बात क्या है?

इस मेले में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग बड़ी संख्या में शामिल होते हैं, जो क्षेत्र की गंगा-जमुनी तहजीब और भाईचारे को दर्शाता है।

Q5. मेले के दौरान यातायात की क्या स्थिति रही?

शुरुआत में मार्ग डायवर्जन में देरी के कारण वाहन मेले के बीच से गुजरते रहे। बाद में प्रशासन ने रस्सी लगाकर यातायात को वैकल्पिक मार्ग की ओर मोड़ा।

Conclusion

धुरियापार का ऐतिहासिक मेला रावण दहन, सांस्कृतिक परंपरा और सामाजिक भाईचारे के लिए खास पहचान रखता है।

शुरुआती यातायात अव्यवस्था के बावजूद लोगों ने उत्साह के साथ मेले में भाग लिया।

बेहतर प्रबंधन के साथ यह आयोजन आने वाले वर्षों में और सुचारु बनाया जा सकता है।

read this postगोरखपुर में शिक्षक-एमएलसी चुनाव के लिए प्रशासन का बड़ा फैसला, मतदान और मतगणना तक शराब की दुकानें रहेंगी बंद