24 साल बाद भी सपा विधायक मंजूर अहमद हत्याकांड अनसुलझा, परिवार को आज भी इंसाफ का इंतजार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चर्चित रहे समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक मंजूर अहमद की हत्या के 24 साल बाद भी उनका परिवार कई सवालों के जवाब तलाश रहा है। छह मार्च 2002 को लखनऊ में राजभवन के पास धरने के दौरान उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इतने वर्षों बाद भी परिवार हत्या के पीछे की वास्तविक वजह और इसमें शामिल लोगों को लेकर स्पष्ट जवाब मिलने की मांग कर रहा है।

मंजूर अहमद बरेली जिले की बहेड़ी विधानसभा सीट से विधायक रहे थे। वह अपने सरल स्वभाव और आम लोगों से सीधे जुड़ाव के लिए जाने जाते थे। उनकी हत्या के बाद क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई थी। अब इतने वर्षों बाद भी यह मामला राजनीतिक इतिहास और न्यायिक जांच से जुड़े कई सवालों के कारण चर्चा में है।

6 मार्च 2002 को लखनऊ में हुई थी विधायक की हत्या

मंजूर अहमद की हत्या उस समय हुई, जब उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू था। छह मार्च 2002 को लखनऊ स्थित राजभवन के पास सपा विधायकों का धरना चल रहा था। इसी दौरान बहेड़ी के तत्कालीन विधायक मंजूर अहमद को गोली मार दी गई।

घटना के बाद उनका शव बहेड़ी पहुंचा तो बड़ी संख्या में लोग उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए जुटे थे। परिवार के लिए यह घटना केवल एक जनप्रतिनिधि की हत्या नहीं, बल्कि उनके जीवन और राजनीतिक भविष्य को बदल देने वाला हादसा साबित हुई।

पुलिस ने अभिषेक को किया था गिरफ्तार

हत्या के बाद पुलिस ने जौनपुर निवासी अभिषेक को घटनास्थल के पास से गिरफ्तार करने की बात कही थी। पुलिस की ओर से उस समय हत्या के पीछे चर्चित होने की चाह को कारण बताया गया था।

हालांकि, मंजूर अहमद के परिवार ने जांच की दिशा और पुलिस की कहानी पर सवाल उठाए। परिवार का कहना था कि हत्या की परिस्थितियों और इसके पीछे की वजह को लेकर कई बातें स्पष्ट नहीं हुईं।

बाद में मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपी गई। लंबी जांच और कानूनी प्रक्रिया के बावजूद परिवार को वह जवाब नहीं मिल सका, जिसकी उसे उम्मीद थी। मामले में आरोपी अभिषेक बरी हो गया। इसके बाद भी परिवार हत्या के पीछे की वास्तविक वजह और जिम्मेदार लोगों की पहचान को लेकर सवाल उठाता रहा।

गवाहों को धमकाने का परिवार ने लगाया आरोप

मंजूर अहमद के बेटे अंजुम रशीद ने आरोप लगाया कि जांच के दौरान गवाहों के साथ उचित व्यवहार नहीं हुआ। उनके अनुसार, जब गवाहों को बयान देने के लिए बुलाया गया तो उनसे ऐसे सवाल किए गए, जिनसे वे भयभीत हो गए।

परिवार का दावा है कि गवाहों को प्रोत्साहित करने और घटना की कड़ियां जोड़ने के बजाय उन पर ही संदेह जताया गया। अंजुम रशीद के मुताबिक, इसी अनुभव के बाद परिवार और गवाहों का जांच प्रक्रिया से भरोसा कमजोर पड़ गया।

हालांकि, जांच अधिकारी के कामकाज पर लगाए गए इन आरोपों को परिवार का पक्ष समझना चाहिए। पूर्व पुलिस अधिकारी राजेश पांडे ने मामले की जांच का बचाव करते हुए कहा कि CBI ने इसकी बारीकी से पड़ताल की थी और जांच पर सवाल उठाना उचित नहीं है। इस तरह मामले की जांच को लेकर परिवार और पूर्व पुलिस अधिकारी के विचार अलग-अलग हैं।

हत्या से पहले फोन आने का भी किया गया दावा

अंजुम रशीद ने यह भी बताया कि हत्या से लगभग चार दिन पहले उनके परिवार के घर के लैंडलाइन फोन पर एक कॉल आई थी। उनके अनुसार, फोन करने वाले व्यक्ति ने कथित तौर पर कहा था कि मंजूर अहमद लखनऊ से वापस नहीं लौटेंगे।

परिवार का कहना है कि इस सूचना के बाद लखनऊ में उनके परिचितों को सतर्क रहने के लिए कहा गया था, लेकिन इसके बावजूद हत्या को नहीं रोका जा सका।

यह दावा परिवार के बयान पर आधारित है। इस फोन कॉल और हत्या के बीच

किसी संबंध की स्वतंत्र पुष्टि के बिना इसे जांच में सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

राजनीतिक जीवन पर भी पड़ा असर

मंजूर अहमद की हत्या के बाद उनके परिवार का राजनीतिक जीवन भी प्रभावित हुआ।

अंजुम रशीद के मुताबिक, परिवार ने वर्षों तक मामले की पैरवी की,

लेकिन लगातार प्रयासों के बावजूद उन्हें अपेक्षित परिणाम नहीं मिला।

उन्होंने बताया कि परिवार को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा और

राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उनकी आगे बढ़ने की संभावनाएं प्रभावित हुईं।

अंजुम रशीद ने चुनाव भी लड़े, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

अब परिवार की अगली पीढ़ी भी हत्या की वजह और जिम्मेदार लोगों की

पहचान के बारे में जानना चाहती है। परिवार के लिए यह मामला केवल

पुरानी राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि वर्षों से अधूरे पड़े न्याय का सवाल है।

146 विधायकों की मौजूदगी को लेकर भी उठाए सवाल

अंजुम रशीद ने दावा किया कि घटना के समय बड़ी संख्या में विधायक मौके पर मौजूद थे,

लेकिन परिवार को अब तक हत्या से जुड़ी परिस्थितियों के बारे में संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाया।

उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि गोली किस दिशा से चली थी और घटना के समय

वहां मौजूद लोगों के बयान से पूरे घटनाक्रम की स्पष्ट तस्वीर क्यों नहीं सामने आई।

इन सवालों का जवाब देने के लिए जांच के आधिकारिक अभिलेख,

गवाहियों और न्यायिक दस्तावेजों का परीक्षण आवश्यक है। केवल परिवार के

आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति की भूमिका को दोषपूर्ण नहीं माना जा सकता।

24 साल बाद भी परिवार को जवाब का इंतजार

मंजूर अहमद हत्याकांड यह सवाल सामने लाता है कि लंबे समय तक चलने वाली जांच और

कानूनी प्रक्रिया के बाद भी पीड़ित परिवार किन परिस्थितियों में खुद को असहाय महसूस कर सकता है।

परिवार की मांग है कि हत्या के पीछे की वास्तविक वजह स्पष्ट हो और घटना से जुड़े

अनुत्तरित सवालों का जवाब मिले। दूसरी ओर, जांच का बचाव करने वाले

पूर्व अधिकारी का कहना है कि मामले की पड़ताल की गई थी।

इसलिए इस मामले की पूरी तस्वीर समझने के लिए परिवार के बयानों के साथ-साथ जांच रिपोर्ट,

अदालत के फैसले और उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों को भी देखना जरूरी है।

निष्कर्ष: बहेड़ी के पूर्व सपा विधायक मंजूर अहमद की हत्या को 24 साल बीत चुके हैं,

लेकिन परिवार के अनुसार हत्या की वजह और जिम्मेदार लोगों की

पहचान को लेकर कई सवाल बाकी हैं। आरोपी के बरी होने के बाद भी

परिवार न्याय की उम्मीद लगाए हुए है। मामले में लगाए गए आरोपों और जांच संबंधी दावों का

निष्पक्ष मूल्यांकन आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

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