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यह समाचार clipping गोरखपुर के ऐतिहासिक घंटाघर के सौंदर्यीकरण और उसके ऐतिहासिक महत्व पर आधारित है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं –
नए स्वरूप में ऐतिहासिक घंटाघर
गोरखपुर का ऐतिहासिक घंटाघर, जो स्वतंत्रता आंदोलन की यादों से जुड़ा हुआ है, अब एक नए स्वरूप में दिखाई देने लगा है। नगर निगम द्वारा इसका सौंदर्यीकरण लगभग एक करोड़ रुपये की लागत से कराया जा रहा है।
इस सौंदर्यीकरण कार्य के अंतर्गत –
- घंटाघर पर नई बड़ी घड़ी लगाई जा चुकी है।
- इसमें डिजिटल बेल (घंटी) लगाई जाएगी।
- स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की बड़ी फोटो भी स्थापित की जाएगी।
नगर निगम की योजना
नगर निगम अधिकारियों के अनुसार घंटाघर की दीवारों की मरम्मत, रंग-रोगन और आसपास के क्षेत्र का भी सौंदर्यीकरण किया जा रहा है। कार्य अब अंतिम चरण में पहुँच चुका है।
ऐतिहासिक महत्व
- यह घंटाघर 1930 में निर्मित हुआ था।
- यह स्थान स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा है।
- वर्ष 1857 में यहां एक विशाल पाकड़ का पेड़ था। इसी पेड़ पर अंग्रेजों ने कई स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी दी थी।
विशेष रूप से –
- 19 दिसंबर 1927 को जब जिला कारागार में महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी दी गई, तो उनकी शवयात्रा इसी घंटाघर के पास रुकी थी।
- उस समय बिस्मिल की माता ने यहां पर पुत्र के शव को देखकर अंतिम दर्शन किया था।
- इसके बाद घंटाघर का यह स्थान क्रांतिकारियों की याद में और भी अधिक पवित्र व ऐतिहासिक बन गया।
वर्तमान स्वरूप
आज घंटाघर को उसी ऐतिहासिक गरिमा के अनुरूप नया स्वरूप दिया जा रहा है।
- डिजिटल बेल से समय की सूचना मिलेगी।
- पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की छवि और उनकी शहादत से जुड़ी स्मृतियाँ यहां को अमर बनाएंगी।
- इस स्थान को गोरखपुर और देश की स्वतंत्रता की गाथाओं से जोड़कर पर्यटकों व नागरिकों के लिए गौरवस्थल बनाया जाएगा।
➡️ सारांश:
गोरखपुर का घंटाघर सिर्फ समय बताने वाली एक इमारत नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्रता आंदोलन और शहीदों की स्मृतियों का सजीव प्रतीक है। नगर निगम द्वारा हो रहा इसका सौंदर्यीकरण न केवल इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करेगा बल्कि आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति और स्वतंत्रता संग्राम की गाथाओं से भी जोड़कर रखेगा।