उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने की चर्चा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। प्रदेश सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने हाल में दावा किया है कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश को चार अलग-अलग राज्यों में विभाजित किया जा सकता है। उनके अनुसार प्रस्तावित चार क्षेत्र पूर्वांचल, मध्यांचल, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश होंगे।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अभी केंद्र सरकार की ओर से उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में विभाजित करने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। राजभर का बयान इस पुरानी मांग को फिर चर्चा में लेकर आया है।
राजभर ने क्या कहा?
ओम प्रकाश राजभर ने सितंबर 2026 में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन की बात कही। उन्होंने दावा किया कि जातिगत जनगणना के बाद राज्य के चार हिस्सों में विभाजन की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
राजभर ने यह भी कहा कि अलग पूर्वांचल राज्य बनने की स्थिति में वहां मुख्यमंत्री पद पर राजभर समाज से किसी व्यक्ति को देखना उनकी राजनीतिक प्राथमिकता होगी। यह उनका राजनीतिक बयान है और इसे वर्तमान में किसी सरकारी निर्णय के रूप में नहीं देखा जा सकता।
चार राज्य बने तो कौन सा क्षेत्र कहां होगा?
प्रस्तावित चार-राज्य मॉडल में उत्तर प्रदेश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों को अलग प्रशासनिक इकाइयों में रखने की बात की जाती है।
1. पूर्वांचल
पूर्वी उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से को पूर्वांचल राज्य के रूप में प्रस्तावित किया जाता रहा है। इसमें गोरखपुर, वाराणसी, आजमगढ़, देवरिया, कुशीनगर, महाराजगंज, संतकबीर नगर, बस्ती, गाजीपुर, बलिया, मऊ और आसपास के क्षेत्र शामिल किए जाने की चर्चाएं रही हैं।
हालांकि, प्रस्तावित जिलों की अंतिम सूची किसी आधिकारिक पुनर्गठन कानून के बिना तय नहीं मानी जा सकती।
2. मध्यांचल या अवध प्रदेश
उत्तर प्रदेश के मध्य हिस्से को मध्यांचल अथवा अवध प्रदेश के रूप में अलग राज्य बनाने का विचार भी पुरानी चर्चाओं में रहा है।
लखनऊ और आसपास के मध्य उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों को इस प्रस्तावित इकाई का हिस्सा माना जाता है। 2011 में तत्कालीन राज्य सरकार के प्रस्ताव में इसका नाम अवध प्रदेश रखा गया था।
3. बुंदेलखंड
दक्षिणी उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र लंबे समय से अलग राज्य की मांग से जुड़ा रहा है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के साथ मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों को जोड़कर अलग राज्य बनाने की मांग भी अलग-अलग समय पर सामने आती रही है।
इसी वजह से यदि कभी राज्य पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू होती है तो बुंदेलखंड की सीमा और इसमें शामिल होने वाले जिलों को लेकर व्यापक चर्चा की जरूरत होगी।
4. हरित प्रदेश या पश्चिमी उत्तर प्रदेश
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए हरित प्रदेश अथवा पश्चिम प्रदेश की मांग भी पुरानी है। पश्चिमी क्षेत्र के जिलों को अलग राज्य के रूप में संगठित करने का विचार विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों द्वारा समय-समय पर उठाया गया है।
इस प्रस्तावित राज्य की सीमा को लेकर भी अभी कोई अंतिम सरकारी नक्शा मौजूद नहीं है।
उत्तर प्रदेश को बांटने की मांग नई नहीं
उत्तर प्रदेश के विभाजन की चर्चा कई वर्षों से होती रही है। वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश के पर्वतीय हिस्से को अलग करके उत्तरांचल बनाया गया था, जिसे बाद में उत्तराखंड नाम दिया गया।
इसके बाद भी उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों को अलग राज्यों में बांटने की मांग जारी रही।
मायावती सरकार ने भी रखा था चार राज्यों का प्रस्ताव
उत्तर प्रदेश के विभाजन को लेकर सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक कदम 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की सरकार के दौरान सामने आया था।
तत्कालीन विधानसभा ने उत्तर प्रदेश को पूर्वांचल, पश्चिम प्रदेश, अवध प्रदेश और बुंदेलखंड में बांटने का प्रस्ताव पारित किया था। यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया था, लेकिन आगे चलकर इसे राज्य गठन के रूप में लागू नहीं किया जा सका।
इससे पहले 2008 में भी मायावती सरकार की ओर से राज्य को छोटे राज्यों में
विभाजित करने की मांग उठाई गई थी। उसी दौर में उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन को
लेकर अन्य राजनीतिक दलों और संगठनों ने भी अलग-अलग प्रस्ताव रखे थे।
छोटे राज्य बनाने के पक्ष में क्या तर्क दिए जाते हैं?
चार छोटे राज्यों की मांग करने वाले नेताओं और संगठनों का प्रमुख तर्क प्रशासनिक सुविधा से जुड़ा रहा है।
उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश का क्षेत्रफल और आबादी बहुत बड़ी है, इसलिए छोटे प्रशासनिक राज्यों से
शासन और विकास योजनाओं को स्थानीय स्तर पर लागू करना आसान हो सकता है।
उत्तर प्रदेश की अलग-अलग क्षेत्रों में आर्थिक, कृषि, भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां भी अलग हैं।
इसी आधार पर क्षेत्रीय विकास को लेकर अलग-अलग राज्य बनाने की मांग सामने आती रही है।
विरोध में क्या तर्क दिए जाते हैं?
राज्य विभाजन के विरोध में यह तर्क दिया जाता है कि नया राज्य बनाने से प्रशासनिक ढांचा, परिसंपत्तियों,
कर्मचारियों, वित्तीय संसाधनों और सीमाओं के बंटवारे से जुड़े कई जटिल सवाल पैदा हो सकते हैं।
इसके अलावा केवल राज्य का आकार छोटा होने से क्षेत्रीय असमानताएं अपने आप खत्म होंगी,
यह जरूरी नहीं है। नए राज्यों के गठन के लिए
संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है।
क्या अभी उत्तर प्रदेश के चार टुकड़े होने वाले हैं?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। सितंबर 2026 में चार राज्यों के गठन को लेकर
राजनीतिक बयान जरूर सामने आए हैं, लेकिन केंद्र सरकार की ओर से
ऐसा कोई आधिकारिक फैसला या पुनर्गठन कानून घोषित नहीं हुआ है।
इसलिए फिलहाल इसे राजनीतिक मांग और प्रस्तावित पुनर्गठन की बहस के रूप में देखना
अधिक उचित है, न कि तय हो चुके राज्य विभाजन के रूप में।
2027 विधानसभा चुनाव से पहले क्यों बढ़ी चर्चा?
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं।
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में राज्य के पुनर्गठन का मुद्दा फिर चर्चा में आया है। राजभर के बयान के बाद
विभिन्न राजनीतिक नेताओं ने इस मुद्दे पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दी हैं।
इसलिए आने वाले समय में यह मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति और क्षेत्रीय विकास से
जुड़ी बहस का हिस्सा बना रह सकता है।
निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में बांटने की चर्चा नई नहीं है। पूर्वांचल, मध्यांचल/अवध,
बुंदेलखंड और हरित प्रदेश के रूप में राज्य के पुनर्गठन का प्रस्ताव पहले भी
राजनीतिक स्तर पर सामने आ चुका है। 2011 में मायावती सरकार ने
चार राज्यों का प्रस्ताव विधानसभा से पारित कराया था, लेकिन वह लागू नहीं हो सका।
अब ओम प्रकाश राजभर के ताजा बयान से यह बहस फिर तेज हुई है। हालांकि, फिलहाल चार
नए राज्यों के गठन को लेकर कोई अंतिम सरकारी निर्णय सामने नहीं आया है। इसलिए पाठकों को
राजनीतिक बयानों और आधिकारिक फैसले के बीच अंतर समझना जरूरी है।
read this post :शी जिनपिंग के स्वागत में ट्रंप का अलग अंदाज, गर्म मौसम में कोट और दस्ताने ने खींचा लोगों का ध्यान