नई दिल्ली। किडनी फेलियर से जूझ रहे मरीजों के लिए अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र से एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। वैज्ञानिकों ने जेनेटिकली मॉडिफाइड सूअर की किडनी को इंसान के शरीर में प्रत्यारोपित करने के प्रयोग में बड़ी सफलता हासिल की है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्यारोपित किडनी ने करीब 271 दिनों तक काम किया, इस दौरान मरीज को डायलिसिस की जरूरत नहीं पड़ी। बाद में मरीज को मानव डोनर से किडनी ट्रांसप्लांट की गई।
मानव अंगों की कमी के बीच इस उपलब्धि को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं, जो गंभीर किडनी रोगियों को उपयुक्त मानव अंग मिलने तक राहत दे सकें।
इंसान में क्यों लगाई गई सूअर की किडनी?
गंभीर किडनी फेलियर की स्थिति में गुर्दे शरीर से अपशिष्ट पदार्थ और अतिरिक्त तरल पर्याप्त मात्रा में बाहर नहीं निकाल पाते। ऐसे मरीजों को अक्सर डायलिसिस की जरूरत पड़ती है, जबकि कई मामलों में किडनी ट्रांसप्लांट लंबे समय का समाधान हो सकता है।
समस्या यह है कि जरूरतमंद सभी मरीजों के लिए समय पर उपयुक्त मानव डोनर किडनी उपलब्ध नहीं हो पाती। इसी चुनौती को देखते हुए वैज्ञानिक Xenotransplantation यानी एक प्रजाति के अंग को दूसरी प्रजाति के शरीर में प्रत्यारोपित करने की तकनीक पर शोध कर रहे हैं।
जेनेटिक बदलाव के बाद तैयार की गई किडनी
इस प्रयोग में इस्तेमाल की गई किडनी सामान्य सूअर की किडनी नहीं थी। वैज्ञानिकों ने जेनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से उसमें ऐसे बदलाव किए, जिनका उद्देश्य मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा अंग को तेजी से अस्वीकार किए जाने की संभावना को कम करना था।
ऐसी जेनेटिक एडिटिंग का लक्ष्य प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को नियंत्रित करना और प्रत्यारोपित अंग के मानव शरीर में अधिक समय तक काम करने की संभावना बढ़ाना है।
271 दिनों तक डायलिसिस से मिली राहत
इस प्रयोग का सबसे अहम पहलू यह रहा कि प्रत्यारोपित सूअर की किडनी ने लंबे समय तक काम किया। रिपोर्ट के मुताबिक, मरीज 271 दिनों तक डायलिसिस से मुक्त रहा।
करीब नौ महीने तक डायलिसिस की आवश्यकता नहीं पड़ना इस प्रयोग की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इससे वैज्ञानिकों को यह संभावना तलाशने का आधार मिला है कि भविष्य में जेनेटिकली एडिट किए गए पशु अंग गंभीर मरीजों के लिए अस्थायी चिकित्सा सहायता यानी ‘ब्रिज’ की भूमिका निभा सकते हैं।
क्या सूअर की किडनी हमेशा के लिए काम कर सकती है?
फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। यह तकनीक अभी शोध और चिकित्सकीय परीक्षण के दौर में है।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ समय बाद मरीज में ऐसी परिस्थितियां सामने आईं, जिनके कारण प्रत्यारोपित सूअर की किडनी को हटाना पड़ा। इसके बाद मानव डोनर की किडनी उपलब्ध होने तक मरीज को फिर से डायलिसिस की जरूरत पड़ी।
इससे पता चलता है कि तकनीक ने बड़ी संभावनाएं जरूर दिखाई हैं, लेकिन इसे नियमित चिकित्सा का
हिस्सा बनाने से पहले कई वैज्ञानिक और चिकित्सकीय चुनौतियों का समाधान जरूरी होगा।
इसके बाद मरीज को मिली मानव डोनर की किडनी
इस प्रयोग का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा यह रहा कि बाद में
मरीज को मानव डोनर की किडनी ट्रांसप्लांट की गई।
यही वजह है कि वैज्ञानिक इस तरह के प्रयोगों को संभावित ‘ब्रिज’ तकनीक के तौर पर देख रहे हैं।
आसान भाषा में कहें तो भविष्य में यदि किसी गंभीर
मरीज को तत्काल मानव किडनी उपलब्ध नहीं हो पाती, तो जेनेटिकली एडिटेड
पशु की किडनी कुछ समय तक उसके शरीर के लिए किडनी का काम कर सकती है।
किडनी मरीजों के लिए क्यों बड़ी उम्मीद?
दुनिया भर में किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत वाले मरीजों की संख्या उपलब्ध मानव डोनर
अंगों की तुलना में अधिक है। ऐसे में कई मरीजों को लंबे समय तक डायलिसिस पर रहना पड़ता है।
यदि Xenotransplantation तकनीक आगे चलकर सुरक्षित और प्रभावी साबित होती है,
तो यह मानव डोनर अंगों की कमी को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
हालांकि, वैज्ञानिकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे अंग लंबे समय तक सुरक्षित तरीके से
काम करें और मरीज के शरीर में गंभीर प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया या संक्रमण जैसी जटिलताएं पैदा न हों।
मेडिकल साइंस के लिए 271 दिनों का क्या मतलब है?
इस उपलब्धि का महत्व केवल इतना नहीं है कि एक मरीज लंबे समय तक
डायलिसिस से दूर रहा। इसका बड़ा महत्व यह है कि जेनेटिकली एडिट किए गए
पशु अंग ने मानव शरीर में लंबे समय तक काम करने की क्षमता दिखाई।
यह उपलब्धि भविष्य में होने वाले बड़े अध्ययनों के लिए आधार बन सकती है।
बेहतर जेनेटिक एडिटिंग, प्रतिरक्षा नियंत्रण और अंग संरक्षण
तकनीकों के विकास के साथ इस क्षेत्र में आगे और प्रगति की उम्मीद की जा रही है।
निष्कर्ष
जेनेटिकली एडिटेड सूअर की किडनी का इंसान में 271 दिनों तक काम करना
अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि माना जा रहा है।
हालांकि इसे अभी सामान्य इलाज का विकल्प नहीं माना जा सकता, लेकिन
इस प्रयोग ने मानव डोनर अंगों की कमी से जूझ रहे किडनी मरीजों के लिए नई संभावना जरूर दिखाई है।
भविष्य में यदि इस तकनीक की सुरक्षा और प्रभावशीलता लगातार साबित होती है, तो
यह डायलिसिस और किडनी ट्रांसप्लांट की मौजूदा व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है।
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