उत्तर प्रदेश में मानसून ने इस बार मौसम की एक ऐसी तस्वीर पेश की है, जिसमें एक ही राज्य के अलग-अलग हिस्सों में बिल्कुल विपरीत परिस्थितियां देखने को मिल रही हैं। कहीं लगातार बारिश से जलभराव और नदियों के बढ़ते जलस्तर ने लोगों की मुश्किलें बढ़ाई हैं तो कहीं पर्याप्त बारिश नहीं होने से खेत और ग्रामीण इलाके पानी की कमी से जूझ रहे हैं।
प्रदेश में अगस्त के दौरान कई इलाकों में जमकर बादल बरसे, लेकिन इसका लाभ सभी जिलों को समान रूप से नहीं मिल पाया। मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के 28 जिलों में अब भी सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है। इनमें आठ जिले ऐसे हैं जहां बारिश की कमी बेहद ज्यादा है।
28 जिलों में सामान्य से कम बारिश
क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र, लखनऊ के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में मानसून का वितरण इस बार काफी असमान रहा है। प्रदेश के 28 जिलों में सामान्य से कम वर्षा हुई है।
इनमें आठ जिलों में सामान्य से 60 से 90 फीसदी तक कम बारिश रिकॉर्ड की गई है। वहीं अन्य 20 जिलों में बारिश की कमी 20 से 59 फीसदी के बीच रही।
यानी प्रदेश के कई हिस्सों में जहां बारिश की अधिकता ने जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति पैदा की, वहीं दूसरी ओर कुछ जिलों में मानसून की पर्याप्त सक्रियता नहीं होने से पानी की कमी बनी रही।
इन आठ जिलों में सबसे ज्यादा बारिश की कमी
बारिश की सबसे ज्यादा कमी वाले आठ जिलों में भदोही, देवरिया, कुशीनगर, कानपुर देहात, गाजियाबाद और शामली समेत अन्य जिले शामिल हैं।
इन जिलों में सामान्य मानसूनी बारिश के मुकाबले काफी कम वर्षा दर्ज की गई है। अगस्त में प्रदेश के कई हिस्सों में तेज बारिश होने के बावजूद इन क्षेत्रों में बारिश की कमी दूर नहीं हो सकी।
इसका सीधा असर ग्रामीण क्षेत्रों और खेती-किसानी पर भी पड़ सकता है, क्योंकि मानसून की बारिश कृषि गतिविधियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
20 जिलों में भी 20 से 59 फीसदी कम बारिश
सिर्फ आठ जिले ही नहीं, बल्कि प्रदेश के 20 अन्य जिले भी सामान्य बारिश से पीछे हैं। इन जिलों में बारिश की कमी 20 से 59 फीसदी तक दर्ज की गई है।
इस सूची में गोरखपुर, जौनपुर, महाराजगंज, मऊ, संतकबीरनगर, श्रावस्ती, सिद्धार्थनगर और सीतापुर जैसे जिले शामिल हैं।
इन क्षेत्रों में मानसून के दौरान बारिश तो हुई, लेकिन वह सामान्य स्तर तक नहीं पहुंच सकी। ऐसे में सितंबर की बारिश इन जिलों के लिए काफी अहम मानी जा रही है।
एक तरफ जलभराव, दूसरी तरफ खेतों में पानी की कमी
उत्तर प्रदेश में इस मानसून की सबसे खास बात बारिश का असमान वितरण रहा है। कुछ जिलों में लगातार हुई बारिश के कारण सड़कें पानी में डूब गईं और निचले इलाकों में जलभराव की स्थिति बनी।
कई स्थानों पर नदियों और नालों का जलस्तर भी बढ़ा। इसके विपरीत जिन जिलों में सामान्य से काफी कम बारिश हुई, वहां ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की कमी की स्थिति बनी रही।
इस तरह प्रदेश में एक ही समय पर कहीं अतिरिक्त पानी तो कहीं बारिश की कमी वाली स्थिति दिखाई दे रही है।
अगस्त में कई इलाकों में हुई रिकॉर्ड बारिश
प्रदेश के कुछ हिस्सों में अगस्त में बारिश का दौर बेहद तेज रहा। इससे पहले अगस्त की बारिश ने कई जिलों में पुराने रिकॉर्ड भी प्रभावित किए थे।
प्रयागराज में अगस्त के दौरान 631.6 मिलीमीटर और बांदा में
646 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, इन दोनों जिलों में
अगस्त के महीने में इतनी अधिक बारिश पहले दर्ज नहीं की गई थी।
यानी जहां कुछ जिले अत्यधिक बारिश से प्रभावित रहे, वहीं दूसरी ओर
28 जिलों में मानसून सामान्य बारिश का आंकड़ा हासिल नहीं कर सका।
सितंबर की बारिश से पूरी हो सकती है कमी?
अब कम बारिश वाले जिलों की नजर सितंबर के मौसम पर टिकी है। मानसून के
अंतिम चरण में होने वाली बारिश से इन जिलों में वर्षा की कमी कुछ हद तक पूरी होने की उम्मीद है।
मौसम विभाग के मुताबिक सितंबर में प्रदेश के अलग-
अलग हिस्सों में बारिश का दौर जारी रह सकता है। हालांकि,
बारिश का वितरण किस क्षेत्र में कितना रहेगा, यह मौसम की गतिविधियों पर निर्भर करेगा।
कम बारिश वाले जिलों के लिए सितंबर इसलिए भी महत्वपूर्ण है
क्योंकि मानसून के सीजन में अब ज्यादा समय नहीं बचा है।
पश्चिमी यूपी और पूर्वी यूपी में अलग-अलग तस्वीर
मानसून के दौरान उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में बारिश का व्यवहार एक
जैसा नहीं रहा। दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों में कई बार अच्छी बारिश देखने को मिली,
जबकि कुछ पश्चिमी और मध्य क्षेत्रों में बारिश अपेक्षाकृत कम रही।
यही वजह है कि पूरे प्रदेश का औसत आंकड़ा किसी एक जिले या क्षेत्र की
वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाता। किसी जिले में सामान्य से ज्यादा बारिश हो सकती है तो
दूसरे जिले में उसी अवधि में बारिश की भारी कमी बनी रह सकती है।
किसानों के लिए सितंबर का मौसम महत्वपूर्ण
कम बारिश वाले जिलों में किसानों के लिए सितंबर की बारिश विशेष महत्व रखती है।
हालांकि मानसून का अधिकांश हिस्सा गुजर चुका है, लेकिन सितंबर में होने वाली
बारिश मिट्टी की नमी और जल उपलब्धता को प्रभावित कर सकती है।
जिन क्षेत्रों में बारिश सामान्य से काफी कम रही है, वहां आने वाले दिनों में
अच्छी वर्षा होने पर स्थिति में कुछ सुधार संभव है। वहीं अगर बारिश का
वितरण फिर असमान रहा तो कुछ जिलों में कमी बनी रह सकती है।
मौसम की यह तस्वीर क्यों है चिंताजनक?
मानसून की बारिश केवल खेतों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं होती। इसका असर जलाशयों, भूजल,
ग्रामीण जलापूर्ति और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।
एक तरफ अत्यधिक बारिश होने पर बाढ़, जलभराव और फसलों के नुकसान का खतरा बढ़ जाता है।
दूसरी तरफ कम बारिश वाले इलाकों में सिंचाई और पानी की उपलब्धता चुनौती बन सकती है।
इसलिए मानसून का समान और संतुलित वितरण कृषि तथा जल प्रबंधन दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
प्रशासन और मौसम विभाग की निगरानी जरूरी
प्रदेश में बारिश और बाढ़ की स्थिति को देखते हुए प्रशासन को मौसम के
उतार-चढ़ाव पर लगातार नजर रखने की जरूरत है। पहले ही कई जिलों में
भारी बारिश और आकस्मिक बाढ़ की आशंका को लेकर अलर्ट जारी किया जा चुका है।
जहां भारी बारिश हो रही है, वहां जलभराव और बाढ़ से बचाव जरूरी है,
जबकि कम बारिश वाले जिलों में जल उपलब्धता और खेती की स्थिति पर नजर रखना चुनौती है।
निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश में इस बार मानसून की कहानी सिर्फ भारी बारिश की नहीं है।
प्रदेश के 28 जिले अभी भी सामान्य बारिश से पीछे हैं। आठ जिलों में कमी 60 से 90 फीसदी तक है,
जबकि 20 जिलों में 20 से 59 फीसदी तक कम बारिश हुई है।
ऐसे में सितंबर का मौसम इन जिलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।
यदि आने वाले दिनों में अच्छी और
संतुलित बारिश होती है तो वर्षा की कमी कुछ हद तक दूर हो सकती है। फिलहाल यूपी में मानसून की
यह तस्वीर यही बताती है कि एक ही राज्य में कहीं बादल जमकर बरस रहे हैं,
तो कहीं खेत अब भी आसमान की ओर देख रहे हैं।
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