वैदिक विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ श्रावणी उपाकर्म कार्यक्रम, सरयू तट पर विद्वतजनों ने बदला यज्ञोपवीत

राकेश शर्मा की रिपोर्ट

पक्का घाट पर सरयू जल में खड़े होकर हुआ श्रावणी उपाकर्म, वैदिक मंत्रोच्चार से गूंजा वातावरण

गोरखपुर/गोला। गोला उपनगर स्थित पक्का घाट पर शुक्रवार को श्रावणी उपाकर्म कार्यक्रम श्रद्धा, आस्था और वैदिक परंपराओं के साथ विधि-विधानपूर्वक संपन्न हुआ। क्षेत्र के विद्वतजनों एवं पंडितों ने मां सरयू के पवित्र जल में खड़े होकर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रावणी उपाकर्म किया। कार्यक्रम का आयोजन क्षेत्र के सम्मानित आचार्य पंडित तारकेश्वर पांडेय की देखरेख में किया गया।

श्रावणी उपाकर्म के दौरान पक्का घाट पर धार्मिक वातावरण देखने को मिला। वैदिक मंत्रों के उच्चारण और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच विद्वतजनों ने आत्मशुद्धि, प्रायश्चित और आध्यात्मिक नवीनीकरण का संकल्प लिया। कार्यक्रम में सनातन वैदिक परंपरा के अनुसार विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए गए

प्रायश्चित संकल्प और दश विधि स्नान से हुआ शुभारंभ

कार्यक्रम का शुभारंभ प्रायश्चित संकल्प के साथ हुआ। इसके बाद दश विधि स्नान और तर्पण की धार्मिक प्रक्रिया संपन्न की गई। विद्वतजनों ने मां सरयू के पवित्र जल में स्नान कर आत्मशुद्धि का संकल्प लिया तथा निर्धारित वैदिक विधि के अनुसार तर्पण किया।

इसके बाद स्वस्तिवाचन के साथ गौरी-गणेश, नवग्रह और सप्तऋषियों का आह्वान, प्रतिष्ठा एवं पूजन किया गया। पूरे अनुष्ठान के दौरान वैदिक मंत्रों का उच्चारण होता रहा, जिससे पक्का घाट का वातावरण आध्यात्मिक और भक्तिमय बना रहा।

पुराने यज्ञोपवीत का त्याग कर धारण किया नया यज्ञोपवीत

श्रावणी उपाकर्म के प्रमुख अनुष्ठान के रूप में विद्वतजनों ने पुराने यज्ञोपवीत का विधिपूर्वक त्याग किया और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच नया यज्ञोपवीत धारण किया। इस दौरान सभी प्रतिभागियों ने धार्मिक परंपराओं के अनुसार अनुष्ठान में सहभागिता की।

यज्ञोपवीत परिवर्तन को श्रावणी उपाकर्म की महत्वपूर्ण प्रक्रिया माना जाता है। इसके माध्यम से साधक आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक नवीनीकरण के साथ अपने कर्तव्यों तथा ज्ञान की परंपरा के प्रति समर्पण का संकल्प लेता है।

आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक नवीनीकरण का पर्व है श्रावणी उपाकर्म

कार्यक्रम के दौरान आचार्य पंडित तारकेश्वर पांडेय ने श्रावणी उपाकर्म के धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि श्रावणी उपाकर्म आत्मशुद्धि, आध्यात्मिक नवीनीकरण और ज्ञान के प्रति समर्पण का महत्वपूर्ण पर्व है।

उन्होंने बताया कि यज्ञोपवीत परिवर्तन इस अनुष्ठान का प्रमुख हिस्सा है। इस अवसर पर वर्षभर में जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए प्रायश्चित का संकल्प लिया जाता है। साथ ही उन ऋषियों का तर्पण किया जाता है, जिन्होंने वेद और ज्ञान की परंपरा को स्थापित एवं आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आचार्य पांडेय ने कहा कि श्रावणी उपाकर्म केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि वैदिक संस्कृति और ऋषि परंपरा से जुड़ने का अवसर भी है। ऐसे आयोजनों से सनातन वैदिक परंपराओं का निरंतर प्रवाह बना रहता है और नई पीढ़ी को अपनी प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं की जानकारी मिलती है।

बड़ी संख्या में विद्वतजनों ने लिया हिस्सा

श्रावणी उपाकर्म कार्यक्रम में क्षेत्र के कई विद्वान पंडित एवं धार्मिक जन शामिल हुए। सभी ने वैदिक विधि-विधान के अनुसार अनुष्ठान में सहभागिता की और यज्ञोपवीत धारण किया।

इस अवसर पर पंडित दीनानाथ पांडेय, नवीन पाण्डेय, पुष्पराज तिवारी, संतोष पांडेय, गंगा सागर पांडेय, सुरेन्द्र राम, गिरिजा राय, श्रीनाथ शुक्ल, आनंद तिवारी, कृष्ण कुमार, घनश्याम, अरुण तिवारी, हिंसा बाबा, संतोष दुबे, मुन्ना पांडेय, अनिल मिश्र, दिवाकर दुबे सहित अन्य पंडित मौजूद रहे।

कार्यक्रम के दौरान पक्का घाट पर धार्मिक आस्था और वैदिक परंपरा का सुंदर संगम देखने को मिला। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न हुए इस आयोजन ने क्षेत्र में सनातन परंपरा और धार्मिक संस्कृति की निरंतरता को भी प्रदर्शित किया।