पडरौना राजदरबार की मृतक खातेदार रानी रेवती देवी से जुड़े करीब 44 साल पुराने सीलिंग विवाद का प्रशासनिक स्तर पर अंतिम निस्तारण हो गया है। प्रशासन के आदेश के बाद 1503.57 एकड़ अतिरिक्त भूमि राज्य सरकार में निहित कर दी गई है। इस कार्रवाई के दायरे में खड्डा तहसील के 23 और पडरौना तहसील के 68 गांवों समेत 90 से अधिक गांवों की जमीन शामिल है।
अब प्रशासन इस भूमि के उपयोग की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की तैयारी में है। निहित जमीन का इस्तेमाल पात्र गरीब और भूमिहीन परिवारों को कृषि एवं आवासीय पट्टा देने के साथ-साथ अस्पताल, स्कूल, खेल मैदान, आंगनबाड़ी केंद्र, पंचायत भवन और अन्य जनहित की परियोजनाओं के लिए किया जा सकता है।
1978 में शुरू हुआ था सीलिंग विवाद
यह मामला उत्तर प्रदेश अधिकतम जोत सीमा आरोपण यानी सीलिंग अधिनियम के तहत पडरौना राजदरबार की विशाल भू-संपदा से जुड़ा था। संबंधित जमीन कुशीनगर जिले की पडरौना, खड्डा, कसया और कप्तानगंज तहसीलों में स्थित थी।
प्रशासनिक जानकारी के मुताबिक वर्ष 1978 में निर्धारित प्राधिकारी ने राजदरबार की कुछ भूमि को सीलिंग के तहत अतिरिक्त भूमि घोषित किया था। इसके बाद जमीन के अधिकार और सीलिंग कार्रवाई को लेकर कानूनी विवाद शुरू हुआ।
मामला अपीलीय न्यायालय से होते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंचा और लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया में उलझा रहा।
हाईकोर्ट में याचिका भी हुई थी खारिज
मामले से जुड़ी याचिका वर्ष 2002 में डिफॉल्ट के कारण खारिज हो गई थी। इसके साथ ही पूर्व में प्राप्त स्थगन आदेश भी समाप्त हो गया था।
हालांकि इसके बाद भी जमीन से जुड़े रिकॉर्ड और प्रशासनिक कार्रवाई का अंतिम निस्तारण तत्काल नहीं हो सका। करीब चार दशक से अधिक समय तक मामला अलग-अलग स्तरों पर चलता रहा।
14 अगस्त 2026 को आया अंतिम प्रशासनिक आदेश
प्रशासन के अनुसार 14 अगस्त 2026 को नियत प्राधिकारी (सीलिंग)/अपर जिलाधिकारी (न्यायिक), कुशीनगर ने मामले में अंतिम आदेश पारित किया।
आदेश के तहत विधिक उत्तराधिकारियों के उपयोग के लिए नियमानुसार 18.04 एकड़ सिंचित भूमि छोड़ी गई। इसके अतिरिक्त 1503.57 एकड़ भूमि को अतिरिक्त भूमि घोषित करते हुए राज्य सरकार में निहित कर दिया गया।
अब राजस्व अभिलेखों में इस जमीन को राज्य सरकार/सीलिंग मद में दर्ज कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
खड्डा के 23 गांवों में 1127.43 एकड़ जमीन
निहित की गई जमीन में सबसे बड़ा हिस्सा खड्डा तहसील का बताया गया है। प्रशासनिक विवरण के अनुसार खड्डा तहसील के 23 गांवों में 1127.43 एकड़ भूमि अतिरिक्त घोषित की गई है।
वहीं पडरौना तहसील के 68 गांवों में 339.54 एकड़ भूमि इस कार्रवाई के दायरे में आई है।
इसके अतिरिक्त कसया और कप्तानगंज तहसीलों में भी सीलिंग भूमि शामिल है। सभी संबंधित क्षेत्रों को मिलाकर कुल 1503.57 एकड़ भूमि राज्य सरकार में निहित हुई है।
90 से अधिक गांवों की जमीन पर असर
इस प्रशासनिक कार्रवाई का असर 90 से अधिक गांवों पर पड़ने वाला है।
राजस्व रिकॉर्ड में भूमि का नया दर्जा दर्ज होने के बाद संबंधित
गांवों में जमीन के उपयोग और प्रबंधन को लेकर बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
प्रशासन अब यह सुनिश्चित करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है कि सरकारी नियंत्रण में
आई जमीन का इस्तेमाल निर्धारित नियमों और जनहित के अनुसार किया जाए।
गरीब और भूमिहीन परिवारों को मिल सकता है पट्टा
निहित भूमि के उपयोग में प्राथमिकता पात्र गरीब, भूमिहीन और जरूरतमंद परिवारों को दिए जाने की संभावना है।
सरकारी नियमों और पात्रता के आधार पर योग्य परिवारों को कृषि भूमि अथवा
आवासीय पट्टा उपलब्ध कराया जा सकता है। इससे ऐसे परिवारों को
लाभ मिल सकता है जिनके पास खेती या रहने के लिए पर्याप्त जमीन नहीं है।
हालांकि पट्टे का वास्तविक आवंटन राजस्व रिकॉर्ड, पात्रता और लागू सरकारी नियमों के अनुसार ही किया जाएगा।
अस्पताल और स्कूल के लिए भी इस्तेमाल हो सकती है जमीन
सरकारी नियंत्रण में आई जमीन का उपयोग केवल पट्टे देने तक सीमित नहीं रहेगा।
प्रशासनिक योजना के अनुसार आवश्यकता के आधार पर जमीन को अस्पताल, विद्यालय, खेल मैदान, आंगनबाड़ी केंद्र,
पंचायत भवन और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के लिए भी उपलब्ध कराया जा सकता है।
यदि इन परियोजनाओं के लिए जमीन उपलब्ध होती है तो संबंधित ग्रामीण क्षेत्रों में
स्वास्थ्य, शिक्षा, खेल और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार किया जा सकता है।
अवैध कब्जे पर होगी कार्रवाई
सीलिंग भूमि पर अवैध कब्जे को लेकर भी प्रशासन सख्त रुख अपना सकता है।
यदि सरकारी अभिलेखों में निहित जमीन पर किसी व्यक्ति या संस्था का
अवैध कब्जा पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
प्रशासन की प्राथमिकता सरकारी भूमि को सुरक्षित करना और उसका उपयोग निर्धारित नियमों के अनुसार सुनिश्चित करना होगा।
44 साल बाद खत्म हुआ लंबा विवाद
करीब चार दशक से अधिक समय तक चले इस विवाद का अंतिम प्रशासनिक
निस्तारण कुशीनगर के भूमि प्रशासन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
1503.57 एकड़ भूमि का राज्य सरकार में निहित होना क्षेत्र में भूमि प्रबंधन और
सार्वजनिक उपयोग के लिए बड़ी प्रक्रिया की शुरुआत है। अब असली चुनौती इस जमीन के राजस्व
रिकॉर्ड को दुरुस्त करने और नियमानुसार उसका उपयोग सुनिश्चित करने की होगी।
अब आगे क्या होगा?
अब प्रशासन की ओर से राजस्व अभिलेखों में आवश्यक संशोधन, भूमि की स्थिति का सत्यापन और
सरकारी नियंत्रण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। इसके बाद पात्र लाभार्थियों के चयन तथा सार्वजनिक
परियोजनाओं के लिए भूमि चिह्नित करने की कार्रवाई की जा सकती है।
इस पूरी प्रक्रिया में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि निहित भूमि का आवंटन
पारदर्शी तरीके से हो और पात्र गरीब एवं भूमिहीन परिवारों को वास्तविक लाभ मिले।
निष्कर्ष
कुशीनगर में पडरौना राजदरबार से जुड़े 44 साल पुराने
सीलिंग विवाद का अंतिम प्रशासनिक निस्तारण हो गया है।
प्रशासन के आदेश के बाद 1503.57 एकड़ अतिरिक्त भूमि राज्य सरकार में निहित की गई है।
खड्डा के 23 और पडरौना के 68 गांवों समेत 90 से अधिक गांवों की जमीन इस कार्रवाई के दायरे में आई है।
अब इस जमीन के जरिए गरीब और भूमिहीन परिवारों को कृषि एवं आवासीय पट्टा देने के साथ अस्पताल, स्कूल,
खेल मैदान और अन्य जनहितकारी परियोजनाओं के लिए भूमि उपलब्ध कराने की संभावनाएं बढ़ गई हैं।
44 साल पुराने विवाद के खत्म होने के बाद अब नजर इस बात पर रहेगी कि
सरकारी नियंत्रण में आई इतनी बड़ी भूमि का उपयोग किस तरह और कितनी तेजी से जनहित में किया