हाल ही में उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के चंदवक क्षेत्र के एक सरकारी स्कूल में जाति आधारित भेदभाव का मामला सामने आया। आरोप है कि स्कूल के एक शिक्षक ने अनुसूचित जाति की छात्रा के साथ जातिसूचक भाषा का उपयोग कर उसे अपमानित किया और स्कूल से बाहर निकाल दिया। इस घटना के बाद गांव के लोगों ने स्कूल का घेराव किया और शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। मामले में पुलिस ने जांच शुरू कर दी है, और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने भी मामले का संज्ञान लिया है।

डीजाति सूचक शब्दों का प्रयोग और प्रभावसरकारी स्कूलों में कभी-कभी जाति सूचक शब्द जैसे “हरिजन” या सीधे जाति के नाम का प्रयोग स्कूल के नामकरण में या बच्चों के पहचान पत्र, टीसी (ट्रांसफर सर्टिफिकेट) आदि में होता है। यह प्रशासनिक तौर पर भी हो सकता है और व्यक्तिगत स्तर पर शिक्षकों के व्यवहार में भी दिखता है।
इस प्रकार के प्रयोग से दलित और अनुसूचित जाति वर्ग के छात्रों में अपमान, आत्म-सम्मान में कमी, और मानसिक पीड़ा होती है। अनेक बार बच्चों को जाति के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जैसे अलग बैठाना, अपशिष्ट कार्य करवाना, पानी पीने से रोकना आदि
सरकार और शिक्षा विभाग की पहलसरकार ने ऐसे जाति सूचक शब्दों के उपयोग पर रोक लगाने के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं। जैसे कि बिहार सरकार ने हरिजन शब्द को स्कूलों के नाम से हटाकर “अनुसूचित जाति” शब्द के प्रयोग को बाध्य किया है। साथ ही शिक्षकों को भी अपने व्यवहार में जातिगत भेदभाव न करने का निर्देश दिया गया है। जिला शिक्षा कार्यालय या संबंधित विभागों द्वारा जाति सूचक शब्दों के प्रयोग पर चेतावनी और सख्त कार्रवाई की जाती है
जाति सूचक शब्द हटाने का उद्देश्यसरकारी स्कूलों से जाति सूचक शब्द हटाने का मुख्य उद्देश्य शिक्षा के क्षेत्र में समावेशिता और समानता को बढ़ावा देना है ताकि बच्चों के बीच जातिगत भेदभाव समाप्त हो सके। स्कूलों के नामों, दस्तावेजों और व्यवहार से जाति आधारित पहचान हटाना जरूरी माना जाता है ताकि सभी बच्चों को समान अवसर मिल सके और मनोवैज्ञानिक प्रभावों से बचा जा सके
उदाहरणबिहार में “हरिजन स्कूल” के नाम बदलकर “अनुसूचित जाति स्कूल” किया गया।उत्तर प्रदेश में दलित छात्र की टीसी पर जाति सूचक शब्दों के प्रयोग से विवाद हुआ।मध्य प्रदेश के एक स्कूल में जातिगत भेदभाव के आरोप लगे, जहां बच्चों को सार्वजनिक नल से पानी पीने से रोका गया और भेदभावपूर्ण व्यवहार किया गया
संक्षेप में, सरकारी स्कूलों में जाति सूचक शब्दों का प्रयोग सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा देता है, जो शिक्षा के उद्देश्य के खिलाफ है। इसलिए सरकार द्वारा इन शब्दों के हटाने और समावेशी माहौल बनाने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं
