श्रीमद्भागवत कथा की पूर्णाहुति: कंस वध, रुक्मिणी विवाह और सुदामा चरित्र सुन भावुक हुए श्रद्धालु

राकेश शर्मा की रिपोर्ट

दीपगढ़ में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का हुआ भव्य समापन

गोरखपुर जनपद की गोला तहसील अंतर्गत ग्राम दीपगढ़ में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन भक्तिमय वातावरण में संपन्न हुआ। कथा के सातवें और अंतिम दिन कथा व्यास श्रीमती अनुराधा तिवारी ने भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा स्थल पर हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहे और भगवान के जयघोष से पूरा पंडाल भक्तिरस में सराबोर हो गया।

सातवें दिन कंस वध, रुक्मिणी विवाह, सुदामा चरित्र और राजा परीक्षित मोक्ष के प्रसंगों का विस्तृत वर्णन किया गया। कथा के दौरान कई बार ऐसा भावुक वातावरण बना कि श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।

धार्मिक आयोजन के समापन पर महाआरती, हवन और विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।

कंस वध प्रसंग सुनकर गूंज उठा पंडाल

कथा व्यास अनुराधा तिवारी ने बताया कि जब भगवान श्रीकृष्ण और बलराम मथुरा पहुंचे तो अत्याचारी राजा कंस ने उन्हें समाप्त करने के लिए अनेक षड्यंत्र रचे। अक्रूर जी दोनों भाइयों को मथुरा लेकर आए थे और वहां कंस ने चाणूर तथा मुष्टिक जैसे बलशाली पहलवानों को उनके सामने उतार दिया।

भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने मल्लयुद्ध में दोनों पहलवानों को परास्त कर दिया। इसके बाद कुवलयापीड हाथी का भी वध किया गया। अंततः भगवान श्रीकृष्ण ने कंस को उसके सिंहासन से नीचे पटककर उसका अंत कर दिया।

कथा व्यास ने कहा कि अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसका अंत निश्चित होता है। भगवान सदैव धर्म और सत्य की रक्षा करते हैं। कंस वध का प्रसंग सुनते ही पूरा पंडाल “जय श्रीकृष्ण” के जयघोष से गूंज उठा।

रुक्मिणी विवाह ने सुनाया सच्चे प्रेम और भक्ति का संदेश

कथा के दौरान रुक्मिणी विवाह प्रसंग का भी अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया गया। कथा व्यास ने बताया कि विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी भगवान श्रीकृष्ण को अपना पति मान चुकी थीं।

जब उनके भाई रुक्मी ने उनका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया तो रुक्मिणी ने भगवान श्रीकृष्ण को संदेश भेजकर अपनी रक्षा की प्रार्थना की। भक्त की पुकार सुनकर भगवान द्वारका से विदर्भ पहुंचे और विवाह मंडप से रुक्मिणी का हरण कर उन्हें अपने साथ ले गए।

द्वारका पहुंचकर वैदिक रीति-रिवाजों के साथ दोनों का विवाह संपन्न हुआ। कथा व्यास ने कहा कि सच्चे मन से की गई भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। भगवान अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनते हैं।

इस प्रसंग ने उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रेम, विश्वास और समर्पण का संदेश दिया।

सुदामा चरित्र सुन भावुक हुए श्रद्धालु

कथा के सबसे मार्मिक प्रसंगों में से एक सुदामा चरित्र रहा। कथा व्यास ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण के बाल सखा सुदामा अत्यंत गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहे थे।

पत्नी के आग्रह पर वे मुट्ठी भर चावल लेकर भगवान श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे। जब द्वारपालों ने उन्हें रोकना चाहा तो भगवान स्वयं नंगे पैर दौड़कर अपने मित्र का स्वागत करने पहुंचे।

भगवान ने सुदामा को गले लगाया, सिंहासन पर बैठाया और उनके चरण धोए।

बिना कुछ मांगे ही सुदामा को अपार संपत्ति और सुख-समृद्धि प्रदान की।

यह प्रसंग सुनते समय अनेक श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। कथा व्यास ने कहा कि भगवान केवल प्रेम और

सच्ची भावना के भूखे हैं, उन्हें दिखावे और धन-दौलत से कोई मतलब नहीं।

परीक्षित मोक्ष और कथा की पूर्णाहुति

कथा के अंतिम चरण में राजा परीक्षित मोक्ष का वर्णन किया गया। कथा व्यास ने बताया कि

राजा परीक्षित ने सात दिनों तक शुकदेव जी के मुखारविंद से श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण किया।

$कथा सुनते-सुनते उनके मन का मोह समाप्त हो गया और उन्होंने पूर्ण रूप से

भगवान की शरण ग्रहण कर ली। सातवें दिन तक्षक नाग के डसने पर भी

उन्होंने भगवान का स्मरण करते हुए अपने प्राण त्याग दिए और मोक्ष प्राप्त किया।

कथा व्यास ने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाला दिव्य ज्ञान है।

इसमें जन्म से लेकर मोक्ष तक की संपूर्ण यात्रा का मार्गदर्शन मिलता है।

महाआरती और विशाल भंडारे के साथ हुआ समापन

कथा के समापन अवसर पर भागवत भगवान की महाआरती की गई। मुख्य यजमान सुभाष विश्वकर्मा देव एवं

उनकी पत्नी श्रीमती विंध्यवासिनी देवी ने विधि-विधान से पोथी पूजन कर कथा का समापन कराया।

इसके बाद हवन-पूजन में सभी श्रद्धालुओं ने आहुति अर्पित की। पूरा पंडाल “

हरि बोल” और “जय श्रीकृष्ण” के जयकारों से गूंज उठा।

आयोजन के अंत में विशाल भंडारे का आयोजन किया गया,

जहां हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण कर कथा का पुण्य लाभ प्राप्त किया।

FAQ,

Q1. श्रीमद्भागवत कथा कहां आयोजित हुई?

गोरखपुर जिले की गोला तहसील के ग्राम दीपगढ़ में।

Q2. कथा व्यास कौन थीं?

श्रीमती अनुराधा तिवारी जी ने कथा का वाचन किया।

Q3. अंतिम दिन कौन-कौन से प्रसंग सुनाए गए?

कंस वध, रुक्मिणी विवाह, सुदामा चरित्र और परीक्षित मोक्ष।

Q4. कथा के समापन पर क्या आयोजन हुआ?

महाआरती, हवन और विशाल भंडारे का आयोजन किया गया।

Q5. मुख्य यजमान कौन थे?

सुभाष विश्वकर्मा देव एवं उनकी पत्नी श्रीमती विंध्यवासिनी देवी।

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