होर्मुज स्ट्रेट में तनाव, दुनिया की सांसें अटकी
मध्य पूर्व का अहम समुद्री मार्ग Strait of Hormuz एक बार फिर दुनिया की नजरों में है। इसी रास्ते से दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल गुजरता है। हालिया तनाव और सुरक्षा खतरों के चलते कई देशों के तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई, जिससे वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ गई।
संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के टैंकर रुके
तनाव के चलते यूएई और सऊदी अरब के कई तेल टैंकर होर्मुज क्षेत्र में रुक गए। इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ा जो इन देशों से तेल आयात करते हैं। खासकर भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए यह स्थिति चिंता का कारण बन गई।
भारत पर मंडराया संकट
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और खाड़ी देशों पर काफी निर्भर है। जैसे ही टैंकरों की आवाजाही रुकी, पेट्रोल-डीजल की सप्लाई पर असर पड़ने का खतरा बढ़ गया। इससे कीमतों में उछाल और सप्लाई चेन बाधित होने की आशंका पैदा हो गई।
रूस बना संकटमोचक
इस संकट के बीच रूस ने भारत की मदद करते हुए तेल सप्लाई को दोगुना कर दिया। रूस पहले से ही भारत को रियायती दरों पर तेल उपलब्ध करा रहा था, लेकिन इस स्थिति में उसने अतिरिक्त खेप भेजकर भारत की ऊर्जा जरूरतों को संतुलित करने में अहम भूमिका निभाई।
दोगुनी सप्लाई से कैसे मिली राहत
रूस की बढ़ी हुई सप्लाई से भारत को कई स्तरों पर राहत मिली।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी नहीं हुई,
रिफाइनरियों को लगातार कच्चा तेल मिलता रहा और बाजार में घबराहट की स्थिति भी कम हुई।
यह कदम भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।
वैश्विक तेल बाजार पर असर
होर्मुज संकट का असर पूरी दुनिया पर देखने को मिला। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया,
शिपिंग लागत में इजाफा हुआ और सप्लाई चेन में अनिश्चितता आ गई। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा है और
कई देशों को अपनी ऊर्जा रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है।
क्या बदल रही है वैश्विक ऊर्जा राजनीति
यह घटनाक्रम साफ संकेत देता है कि ऊर्जा सप्लाई अब केवल व्यापार का विषय नहीं रह गई है,
बल्कि यह भू-राजनीतिक रणनीति का अहम हिस्सा बन चुकी है। भारत और रूस के बीच बढ़ता
ऊर्जा सहयोग आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
आगे क्या होगा
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज क्षेत्र में तनाव लंबे समय तक बना रहा, तो
इसका असर वैश्विक तेल बाजार पर और गहरा हो सकता है। ऐसे में भारत जैसे देशों को अपनी
ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने और वैकल्पिक उपायों पर तेजी से काम करने की जरूरत होगी।
