उत्तर प्रदेश के कानपुर से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने पूरे मेडिकल सिस्टम को हिलाकर रख दिया है। पुलिस ने एक बड़े किडनी रैकेट का भंडाफोड़ करते हुए छह लोगों को गिरफ्तार किया है, जिसमें इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) कानपुर की पदाधिकारी डॉ. प्रीति आहूजा, उनके पति डॉ. सुरजीत सिंह आहूजा, अन्य डॉक्टर और एक दलाल शामिल हैं।
यह गिरोह लंबे समय से गरीब और जरूरतमंद युवकों की किडनी पैसे के लालच में खरीदकर फर्जी दस्तावेजों के जरिए अवैध ट्रांसप्लांट कराता था। जांच में पता चला कि किडनी 6-7 लाख रुपये में खरीदी जाती थी और 60-90 लाख रुपये तक में बेची जाती थी। यह मामला न सिर्फ मेडिकल एथिक्स का उल्लंघन है, बल्कि गरीबों के शोषण की भी मिसाल है।
कैसे चलता था किडनी रैकेट?
यह गिरोह बेहद संगठित तरीके से काम करता था। दलाल गरीब युवकों, छात्रों और बेरोजगारों को टारगेट करते थे। उन्हें अच्छी रकम देने का लालच देकर किडनी डोनेट करने के लिए तैयार किया जाता था।
ट्रांसप्लांट के लिए फर्जी रिश्तेदारी के दस्तावेज तैयार किए जाते थे, ताकि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने का दिखावा किया जा सके। मुख्य रूप से आहूजा हॉस्पिटल में सर्जरी होती थी, जबकि मेडलाइफ हॉस्पिटल और प्रिया हॉस्पिटल एंड ट्रॉमा सेंटर भी इसमें शामिल थे।
दलाल पूरे नेटवर्क को कनेक्ट करते थे और मरीजों (जिनमें विदेशी भी शामिल थे) से भारी रकम वसूल की जाती थी। एक शिकायत के अनुसार, एक MBA छात्र को मात्र 50 हजार रुपये का भुगतान विवाद होने पर पूरा रैकेट सामने आया। जांच में करीब 50 अवैध ट्रांसप्लांट का अंदेशा है।
पुलिस की कार्रवाई और छापेमारी
पुलिस को सूचना मिलते ही क्राइम ब्रांच और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम गठित की गई। कल्याणपुर क्षेत्र के अस्पतालों पर देर रात छापेमारी की गई।
आहूजा हॉस्पिटल, मेडलाइफ हॉस्पिटल और प्रिया हॉस्पिटल से मेडिकल रिकॉर्ड, दस्तावेज और अन्य सबूत जब्त किए गए। पूछताछ में दलाल शिवम अग्रवाल समेत पूरे नेटवर्क का खुलासा हुआ।
गिरफ्तार आरोपियों में डॉ. प्रीति आहूजा (50), डॉ. सुरजीत सिंह आहूजा (54), डॉ. राजेश कुमार (44), डॉ. राम प्रकाश (40), डॉ. नरेंद्र सिंह (35) और दलाल शिवम अग्रवाल (34) शामिल हैं। सभी को जेल भेज दिया गया है। स्वास्थ्य विभाग ने अस्पतालों को नोटिस जारी किए और एक अस्पताल सील करने की प्रक्रिया शुरू की।
अस्पतालों की भूमिका पर उठे सवाल
इस मामले में तीन निजी अस्पतालों की संलिप्तता साफ तौर पर सामने आई है। अस्पतालों में अवैध ट्रांसप्लांट अस्पताल संचालकों की जानकारी में हो रहे थे। महंगे ऑपरेशन थिएटर किराए पर दिए जाते थे, जबकि मेडिकल रिकॉर्ड्स में हेराफेरी की जाती थी।
यह मेडिकल एथिक्स का खुला उल्लंघन है। मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ किया गया,
क्योंकि अवैध तरीके से किए गए ट्रांसप्लांट में संक्रमण और अन्य जोखिम बढ़ जाते हैं।
अब सवाल उठ रहे हैं कि निजी अस्पतालों की निगरानी इतनी कमजोर क्यों है?
कानूनी कार्रवाई और सजा
भारत में अंगों की अवैध खरीद-फरोख्त ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन ऑर्गन्स एक्ट (THOA) के तहत
गंभीर अपराध माना जाता है। दोषी पाए जाने पर
5 से 10 साल तक की सजा, भारी जुर्माना और मेडिकल लाइसेंस रद्द करने का प्रावधान है।
पुलिस आगे की जांच कर रही है और चार अन्य डॉक्टरों की तलाश जारी है।
यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लिंक पाए गए तो रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी हो सकता है।
समाज के लिए बड़ा खतरा
यह मामला गरीबों के शोषण, मानव अंग तस्करी और मेडिकल सिस्टम में भ्रष्टाचार का जीता-जागता उदाहरण है।
गरीब युवा पैसे के लिए अपनी किडनी बेचने को मजबूर होते हैं, जबकि अमीर मरीज भारी कीमत चुकाते हैं।
इससे मेडिकल प्रोफेशन पर लोगों का विश्वास डगमगा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि
ऐसे रैकेट देशभर में फैले हो सकते हैं, इसलिए सतर्कता जरूरी है।
सरकार और स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी
इस घटना के बाद निजी अस्पतालों की मजबूत निगरानी, अंगदान को बढ़ावा देने वाले
अभियान और टेक्नोलॉजी-आधारित ट्रांसप्लांट ट्रैकिंग सिस्टम की मांग उठ रही है।
स्वास्थ्य विभाग को मेडिकल संस्थाओं की जवाबदेही तय करनी होगी।
अंगदान जागरूकता बढ़ाकर वैध तरीके से जरूरतमंदों की मदद की जा सकती है।
कानपुर का यह किडनी रैकेट देश के लिए एक बड़ी चेतावनी है। जब डॉक्टर जैसे सम्मानित पेशे वाले लोग ही
ऐसे अपराध में शामिल हों, तो पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े हो जाते हैं।
सख्त कानूनी कार्रवाई, पारदर्शी जांच और मेडिकल क्षेत्र में
सुधार ही ऐसे मामलों को रोक सकते हैं। समाज को भी जागरूक रहना होगा ताकि गरीबों का शोषण रुके।
सरकार और प्रशासन को तुरंत कड़े कदम उठाने चाहिए, ताकि मेडिकल सिस्टम पर भरोसा बहाल हो सके।
