काशी विद्वत परिषद
काशी विद्वत परिषद का बड़ा बयान
वाराणसी में काशी विद्वत परिषद ने मसान की होली खेलने की पुरानी परंपरा का खुलकर विरोध किया है।
परिषद ने दावा किया है कि महाश्मशान घाट मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर मसाने की होली खेलना शास्त्रों की परंपराओं के अनुरूप नहीं है।
श्मशान को मोक्ष स्थल माना जाता है, यहां त्योहारों और उत्सवों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
मसान की होली क्या है?
मसान की होली वाराणसी के श्मशान घाटों पर होली के दिन खेली जाने वाली एक अनोखी परंपरा है।
कुछ लोग मानते हैं कि यह परंपरा सदियों पुरानी है।
श्मशान में जलने वाली चिताओं की राख और कोयले से होली जलाकर लोग रंग खेलते हैं।
इसमें कुछ लोग भस्म लगाकर और चिताओं के आसपास नाचते-गाते हैं।
परंपरा के समर्थक इसे मृत्यु पर विजय और जीवन की नश्वरता का प्रतीक बताते हैं।
विद्वत परिषद ने क्यों किया विरोध?
काशी विद्वत परिषद के विद्वानों का कहना है कि शास्त्रों में श्मशान को अशुद्ध और मोक्ष प्राप्ति का स्थान माना गया है।
यहां उत्सव, नृत्य, रंग खेलना या कोई भी त्योहार मनाना शास्त्रीय रूप से वर्जित है।
श्मशान में आत्माओं की शांति के लिए मौन और ध्यान की आवश्यकता है।
परिषद ने कहा कि ऐसी परंपराएं हिंदू धर्म की गरिमा को ठेस पहुंचाती हैं।
मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट जैसे पवित्र स्थलों को उत्सव स्थल बनाने से उनकी पवित्रता भंग होती है।
परंपरा के समर्थकों का पक्ष
मसान की होली के समर्थक इसे लोक परंपरा बताते हैं।
उनका मानना है कि यह काशी की अनोखी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है।
कुछ लोग इसे तंत्र साधना और काल भैरव की पूजा से जोड़ते हैं।
परंपरा के अनुसार, होली के दिन श्मशान में होली जलाने से मृत्यु भय दूर होता है।
विवाद और सामाजिक प्रभाव
यह बयान आने के बाद वाराणसी में चर्चा छिड़ गई है।
एक तरफ विद्वान शास्त्रों का हवाला दे रहे हैं।
दूसरी तरफ स्थानीय लोग और कुछ धार्मिक संगठन परंपरा बचाने की बात कर रहे हैं।
प्रशासन ने भी इस मुद्दे पर नजर रखी हुई है।
श्मशान घाटों पर भीड़ और सुरक्षा को लेकर पहले से ही सतर्कता बरती जाती है।
काशी की धार्मिक परंपराओं का महत्व
वाराणसी को विश्व का सबसे प्राचीन शहर माना जाता है।
यहां की हर परंपरा सदियों पुरानी है।
लेकिन शास्त्र और लोक परंपरा के बीच टकराव नया नहीं है।
काशी विद्वत परिषद का यह बयान धार्मिक विद्वानों और आम लोगों के बीच संवाद की जरूरत को दर्शाता है।
परंपरा को बनाए रखते हुए शास्त्र सम्मत तरीके से आगे बढ़ने की बात हो रही है।
आगे क्या होगा?
यह विवाद होली के समय और तेज हो सकता है।
परिषद ने प्रशासन से भी अपील की है कि श्मशान में ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाई जाए।
स्थानीय लोग और धार्मिक संगठन इस पर अपनी राय रख सकते हैं।
वाराणसी की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को बचाने के लिए संतुलित दृष्टिकोण जरूरी है।