भारतीय सड़कों पर हर साल हजारों मोटर एक्सीडेंट होते हैं, और इनमें मुआवजे की लड़ाई अक्सर लंबी चलती है। हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें स्पष्ट कहा गया कि गाड़ी बिकने के बाद भी अगर रजिस्ट्रेशन ट्रांसफर नहीं हुआ है, तो रजिस्टर्ड ओनर ही मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार रहेगा। बीमा कंपनी ने अपील दायर की थी, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। यह फैसला मोटर व्हीकल एक्ट (MV एक्ट) की धारा 50 और इंश्योरेंस नियमों पर आधारित है। अगर आपने गाड़ी बेच दी है, तो भी नाम ट्रांसफर न होने पर आपको क्लेम का बोझ उठाना पड़ सकता है। आइए विस्तार से समझते हैं इस फैसले का मतलब, बैकग्राउंड और प्रभाव।
केस का बैकग्राउंड: क्या हुआ था दुर्घटना में?
यह मामला एक मोटर एक्सीडेंट से जुड़ा था, जहां ट्रक की चपेट में एक व्यक्ति की मौत हो गई। पीड़ित परिवार ने मुआवजे के लिए केस दायर किया। ट्रक का रजिस्टर्ड ओनर ने दावा किया कि उसने वाहन बेच दिया था, इसलिए जिम्मेदारी नई पार्टी की है। लेकिन RTO में नाम ट्रांसफर नहीं हुआ था। बीमा कंपनी ने भी कहा कि क्लेम रजिस्टर्ड ओनर पर ही है। ट्रायल कोर्ट ने ओनर को मुआवजा देने का आदेश दिया। बीमा कंपनी ने हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन जस्टिस संदीप जैन ने इसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने जोर दिया कि रजिस्ट्रेशन ट्रांसफर MV एक्ट की धारा 50 के तहत अनिवार्य है, बिक्री के मात्र एग्रीमेंट से जिम्मेदारी नहीं हटती।
इस फैसले से साफ है कि गाड़ी बेचने के बाद रजिस्टर्ड ओनर मुआवजा देने के लिए लायबल रहता है, जब तक RTO से फॉर्म 29/30 जमा न हो। 2026 तक ऐसे कई केस पेंडिंग हैं, खासकर पुरानी गाड़ियों में। उदाहरण के तौर पर, केरल हाईकोर्ट और अन्य हाईकोर्ट्स के इसी तरह के फैसलों में भी यही बात कही गई थी।
कानूनी आधार: MV एक्ट और इंश्योरेंस पॉलिसी के नियम
मोटर व्हीकल एक्ट 1988 की धारा 157 के मुताबिक, एक्सीडेंट में थर्ड पार्टी को मुआवजा इंश्योरेंस कंपनी देती है, लेकिन सब्रोगेशन राइट्स के तहत ओनर से रिकवर करती है। गाड़ी ट्रांसफर के बाद मुआवजा से बचने के लिए रजिस्ट्रेशन अपडेट जरूरी। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में भी यही कहा गया है कि सेल डीड अकेला काफी नहीं, रजिस्ट्रेशन ट्रांसफर अनिवार्य है।
बीमा कंपनी की अपील में दलील थी कि नया खरीदार लायबल हो, लेकिन HC ने खारिज करते हुए कहा, “ट्रांसफर सर्टिफिकेट न होने पर पुराना ओनर ही रिस्पॉन्सिबल।” IRDAI गाइडलाइंस भी यही सपोर्ट करती हैं। अगर पॉलिसी थर्ड पार्टी है, तो क्लेम सीधा कंपनी पर, लेकिन नाम न ट्रांसफर होने पर ओनर को पे करना पड़ता है।
गाड़ी बेचने वालों के लिए क्या करें? स्टेप-बाय-स्टेप गाइड
अगर आप गाड़ी बेच रहे हैं, तो मुआवजा क्लेम से बचें इन स्टेप्स से:
स्टेप 1: सेल एग्रीमेंट NOC के साथ साइन करें।
*स्टेप 2: RTO में फॉर्म 29 (नो ऑब्जेक्शन) और फॉर्म 30 (ट्रांसफर) जमा करें।
स्टेप 3: इंश्योरेंस ट्रांसफर के लिए फॉर्म 30 कॉपी दें।
*स्टेप 4: RC बुक अपडेट चेक करें।
बिना इनके, एक्सीडेंट होने पर कोर्ट मुआवजा (5-20 लाख तक) रजिस्टर्ड ओनर पर ठोंक सकता है।
2026 में डिजिटल RTO पोर्टल से ये प्रोसेस आसान हो गया है, लेकिन 80% लोग इग्नोर करते हैं।
जागरूक रहें, कानूनी पचड़े से बचें
यह HC फैसला गाड़ी बिकने के बाद रजिस्टर्ड ओनर मुआवजा के नियम को मजबूत करता है।
बिक्री के बाद तुरंत RTO अपडेट करें, वरना लाखों का बोझ। अगर आप प्रभावित हैं,
तो वकील से सलाह लें। MV एक्ट 2019 के नए नियमों से क्लेम प्रक्रिया तेज हुई है।
सुरक्षित ड्राइविंग और कानूनी अनुपालन ही असली समाधान।
