ऑनलाइन गेमिंग का खतरनाक असर: नौकरी गई तो लग गई ‘फ्रीफायर गेम’ की लत…पैसे तो डूबे ही हाथ आया Depression

आज के डिजिटल युग में ऑनलाइन गेमिंग युवाओं का सबसे बड़ा शौक बन चुका है, लेकिन यह शौक कई बार खतरनाक लत में बदल जाता है। एक ऐसा ही मामला सामने आया है जहां एक युवक ने फ्रीफायर जैसी पॉपुलर ऑनलाइन गेम की लत के चक्कर में अपनी नौकरी गंवाई, लाखों रुपये डूबे और गंभीर डिप्रेशन का शिकार हो गया। मनोवैज्ञानिक डॉ. आकृति पांडेय के अनुसार, ऐसी गेम्स में तुरंत पैसा जीतने का लालच दिमाग में डोपामिन हार्मोन को सक्रिय करता है, जो व्यक्ति को बार-बार गेम खेलने के लिए प्रेरित करता है।

गेमिंग लत कैसे बनती है आदत से बीमारी?

शुरुआत छोटी रकम से होती है—कुछ सौ या हजार रुपये का रिचार्ज करके गेम में एंट्री। जीतने पर खुशी मिलती है, हारने पर “अगली बार जीत लूंगा” का विचार आता है। डॉ. आकृति पांडेय बताती हैं कि यह प्रक्रिया दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम को हाईजैक कर लेती है। डोपामिन हार्मोन की वजह से व्यक्ति को बार-बार उसी एक्शन की तलब रहती है। फ्रीफायर, पबजी, लूडो जैसे गेम्स में रियल मनी टूर्नामेंट्स और इन-गेम पर्चेज ने इस लत को और बढ़ावा दिया है।

एक युवक की कहानी इस समस्या को साफ दर्शाती है। वह आईटी कंपनी में अच्छी सैलरी पर काम करता था। ऑफिस के बाद फ्रीफायर खेलना शुरू किया। पहले छोटे-छोटे टूर्नामेंट में जीत मिली, फिर हारने पर “रिकवर कर लूंगा” के चक्कर में बड़ी रकम लगा दी। कुछ महीनों में 8-10 लाख रुपये डूब गए। कंपनी में परफॉर्मेंस गिरने से नौकरी चली गई। घरवालों से झगड़े बढ़े, नींद उड़ी, चिड़चिड़ापन आया और अंत में डिप्रेशन का शिकार हो गया।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव और डिप्रेशन का खतरा

डॉ. आकृति पांडेय के अनुसार, गेमिंग एडिक्शन से सेरोटोनिन और डोपामिन का असंतुलन हो जाता है। व्यक्ति को सामान्य खुशी नहीं मिलती, सिर्फ गेम खेलने पर ही सुकून महसूस होता है। जब पैसे खत्म हो जाते हैं तो अपराधबोध, चिंता और डिप्रेशन शुरू हो जाता है। कई युवा आत्महत्या जैसी चरम स्थिति तक पहुंच जाते हैं। भारत में हर साल हजारों युवा इस लत के शिकार हो रहे हैं।

परिवार और समाज की जिम्मेदारी

परिवार को युवाओं की स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी चाहिए। अगर कोई दिन में 4-5 घंटे से ज्यादा गेम खेल रहा है और पढ़ाई-काम प्रभावित हो रहा है, तो यह लाल झंडा है। मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग और थेरेपी जरूरी हो जाती है।

सरकार को ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म्स पर सख्त नियम लागू करने चाहिए,

जैसे उम्र सीमा, रियल मनी गेमिंग पर टैक्स और एडिक्शन वार्निंग।

बचाव के उपाय: कैसे बचें इस खतरनाक लत से?

  • रोजाना गेमिंग का समय सीमित करें (अधिकतम 1-2 घंटे)
  • परिवार के साथ समय बिताएं, खेल-कूद में हिस्सा लें
  • अगर लत लग चुकी है तो मनोचिकित्सक से संपर्क करें
  • फाइनेंशियल कंट्रोल रखें, गेम में पैसे न लगाएं
  • स्कूल-कॉलेज में जागरूकता कैंपेन चलाएं

ऑनलाइन गेमिंग मनोरंजन के लिए ठीक है, लेकिन जब यह लत बन जाए तो जीवन बर्बाद कर सकती है।

युवाओं को जागरूक रहना होगा और परिवार को सहयोग करना होगा।

अगर आप या कोई जानकार इस समस्या से जूझ रहा है,

तो तुरंत मदद लें—जीवन की कीमत किसी गेम से ज्यादा है।