इलाहाबाद हाईकोर्ट की नाराजगी: पुलिस मुठभेड़ों का नया ट्रेंड
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा मुठभेड़ों में अभियुक्तों के पैरों में गोली मारने की बढ़ती घटनाओं पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सजा देना न्यायपालिका का विशेषाधिकार है, पुलिस का नहीं। यह टिप्पणी हालिया सुनवाई के दौरान आई, जहां एक मामले में पुलिस ने कथित अपराधी को पैर में गोली मारकर गिरफ्तार किया था। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि पैरों में गोली मारना अब रूटीन बन गया है, लेकिन यह कानून का उल्लंघन है। कोर्ट ने ऐसे मामलों में स्वतंत्र जांच अनिवार्य कर दी है।
पुलिस मुठभेड़ में पैरों में गोली मारने का चलन: क्यों हो रहा है?
उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा मुठभेड़ों में अपराधियों को पैरों में गोली मारना एक सामान्य रणनीति बन गई है। पुलिस का दावा है कि इससे अपराधी को घायल कर गिरफ्तार किया जाता है, बिना जानलेवा चोट पहुंचाए। लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसे “न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग” और “पूरी तरह अस्वीकार्य” करार दिया। कोर्ट के अनुसार, यह तरीका अपराधियों को पूर्वनिर्धारित सजा देने जैसा है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
पिछले दो वर्षों में यूपी में 200 से अधिक ऐसी मुठभेड़ें दर्ज हुई हैं, जिनमें ज्यादातर पैरों या टांगों में गोली मारी गई। मानवाधिकार संगठनों और आयोग ने कई मामलों में पुलिस पर पक्षपातपूर्ण कार्रवाई का आरोप लगाया है। कोर्ट ने कहा कि प्रमोशन, तारीफ या सोशल मीडिया फेम के लिए पुलिस अनावश्यक फायरिंग कर रही है, खासकर छोटे अपराधों (जैसे चोरी) में भी।

सजा देना न्यायपालिका का काम: हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि “सजा देना न्यायपालिका का काम है, पुलिस का नहीं।” पुलिस मुठभेड़ों को “एन्काउंटर जस्टिस” के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। जस्टिस ने पुलिस को निर्देश दिया कि मुठभेड़ के बाद पीड़ित की मेडिकल रिपोर्ट, घटनास्थल का वीडियो फुटेज और घायल व्यक्ति का मजिस्ट्रेट के सामने बयान कोर्ट में पेश किया जाए।
कोर्ट ने 6-पॉइंट गाइडलाइंस जारी की हैं, जिसमें स्वतंत्र जांच (CBCID या अन्य टीम द्वारा), FIR दर्ज करना और
SP/SSP स्तर पर जवाबदेही शामिल है। यदि गाइडलाइंस का पालन नहीं हुआ तो
संबंधित पुलिस अधिकारी अवमानना के लिए जिम्मेदार होंगे।
कोर्ट ने डीजीपी और एसीएस (गृह) से स्पष्टीकरण मांगा है कि क्या
ऐसी गोलीबारी के लिए कोई निर्देश दिए गए थे।
यूपी में मुठभेड़ों का प्रभाव और मानवाधिकार चिंता
उत्तर प्रदेश में हाल के वर्षों में पुलिस मुठभेड़ें बढ़ी हैं,
जो मानवाधिकार संगठनों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के PUCL vs State of Maharashtra (2014)
फैसले का हवाला देते हुए कहा कि बिना मजिस्ट्रेट अनुमति के
ऐसी कार्रवाई असंवैधानिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अपराध नियंत्रण प्रभावित हो सकता है,
लेकिन कानूनी प्रक्रिया मजबूत होगी और पुलिस की मनमानी रुकेगी।
यह फैसला यूपी पुलिस के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि इससे मुठभेड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस का काम कानून लागू करना है
