समुद्री गाय डुगोंग की बढ़ती संख्या: भारत में संरक्षण की सफल कहानी

डुगोंग – समुद्री पारिस्थितिकी की कीस्टोन प्रजाति

डुगोंग, जिसे समुद्री गाय कहा जाता है, एक शाकाहारी समुद्री स्तनधारी है जो मुख्यतः समुद्री घास पर निर्भर रहता है। यह पाक खाड़ी और मन्नार की खाड़ी जैसे उष्णकटिबंधीय जल क्षेत्रों में पाया जाता है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के अनुसार, यह कीस्टोन प्रजाति है जो समुद्री पारिस्थितिकी को संतुलित रखती है। पहले भारत में डुगोंग प्रचुर थे, लेकिन शिकार और जाल में फंसने से संख्या घटी। अब संरक्षण प्रयासों से पुनरुद्धार हो रहा है। तमिलनाडु के डुगोंग संरक्षण रिजर्व ने इसे गति दी।

संख्या में वृद्धि: WII का ड्रोन सर्वे 2023-24

2023-24 में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने ड्रोन सर्वे किया, जिसमें पाक खाड़ी-मन्नार की खाड़ी में 200 से अधिक डुगोंग मिले। यह भारत का पहला डुगोंग संरक्षण रिजर्व है, जो 500 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला। प्रोफेसर के. शिवकुमार का अनुमान है कि कुल संख्या 300 के करीब है।

यह वृद्धि संरक्षण की सफलता दर्शाती है। डुगोंग अर्ध-प्रवासी हैं, जो मानसून के अनुसार क्षेत्र बदलते हैं। सैटेलाइट ट्रैकिंग से उनकी निगरानी मजबूत हो रही है।

मछुआरों की महत्वपूर्ण भूमिका

मछुआरों ने डुगोंग संरक्षण को अपनाया। वे जाल में फंसे डुगोंग बचाते हैं और समुद्र में छोड़ते हैं। तमिलनाडु वन विभाग ने 2024-25 में 80 जागरूकता कार्यक्रम चलाए, जिसमें थंजावुर-पुदुक्कोट्टई के गांव शामिल। पिछले दो दशकों में 20 डुगोंग बचाए गए, जिनमें 2023-25 में चार शामिल। बचाव पर 50,000 रुपये इनाम मिलता है। मछुआरा शेख दाऊद जैसे लोग समुद्री घास क्षेत्रों से दूर रहते हैं।

संरक्षण रिजर्व की स्थापना

2022 में तमिलनाडु सरकार ने पाक खाड़ी के 448-500 वर्ग किमी क्षेत्र को डुगोंग संरक्षण रिजर्व घोषित किया। यह IUCN से मान्यता प्राप्त है। इससे फिन फिश, केकड़े-झींगे का प्रजनन बढ़ा, जो मछुआरों की आजीविका मजबूत करता। रिजर्व में समुद्री घास बहाली, सामुदायिक संपर्क और सोलर लाइटें लगाई गईं। ओमकार फाउंडेशन ने 14 बस्तियों में मदद की।

जागरूकता और वित्तीय प्रोत्साहन

WII का नेशनल डुगोंग रिकवरी प्रोग्राम जागरूकता पर केंद्रित। मछुआरा संघों ने इसे अपना लिया।

वित्तीय योजनाएं आजीविका सुरक्षा प्रदान करतीं।

शिकार अब नियंत्रित है। डुगोंग कोरल, मैंग्रोव संरक्षित रखते हैं, जो मछुआरों के लिए फायदेमंद।

भारत-श्रीलंका सहयोग जरूरी, क्योंकि डुगोंग सीमा पार करते।

चुनौतियां और भविष्य

हालांकि संख्या बढ़ी, जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियां खतरा। टेलीमेट्री ट्रैकिंग से बेहतर निगरानी होगी।

मछुआरों की भागीदारी मॉडल अन्य क्षेत्रों के लिए प्रेरणा।

डुगोंग संरक्षण से जैव विविधता मजबूत होती। सरकारें और समुदाय मिलकर इसे जारी रखें।

संरक्षण की मिसाल

डुगोंग की बढ़ती संख्या भारत के संरक्षण प्रयासों की बड़ी सफलता है।

मछुआरों, सरकार और WII के सहयोग से यह संभव हुआ।

यह मॉडल अन्य लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए प्रेरणा बनेगा। डुगोंग बचाओ – समुद्र बचाओ!

समुद्री जैव विविधता की रक्षा में भारत की जीत!