रामगढ़ ताल गोरखपुर की पहचान है, लेकिन बढ़ता प्रदूषण इसे मिटा रहा है। यह एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व की झील है, जो गोरखपुर शहर के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में फैली हुई है। लगभग 723 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह तालाब (Ramgarh Tal Gorakhpur) पूर्वांचल का प्रमुख पर्यटन स्थल बन चुका है, जहां लोग बोटिंग, पिकनिक और त्योहार मनाने आते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में सीवर, नालों का गंदा पानी, प्लास्टिक कचरा और सिल्ट जमा होने से इसकी स्थिति चिंताजनक हो गई है। प्रदूषण के कारण मछलियां मर रही हैं, दुर्गंध फैल रही है और पर्यटकों की संख्या घट रही है।
रामगढ़ ताल का ऐतिहासिक महत्व
*रामगढ़ ताल का इतिहास प्राचीन है। जनश्रुतियों और बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, ईसा पूर्व छठी शताब्दी में यह क्षेत्र रामग्राम के नाम से जाना जाता था, जो कोलिय गणराज्य की राजधानी था। राप्ती नदी यहां से गुजरती थी, और नदी के मार्ग बदलने से यह तालाब अस्तित्व में आया। गोरखपुर का प्राचीन नाम भी रामग्राम था, जिससे ताल का नाम रामगढ़ पड़ा। यह झील गोरखपुर की सांस्कृतिक धरोहर है, जहां त्योहार, मेले और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। योगी सरकार के प्रयासों से यहां क्रूज, बोटिंग और सुंदर्यीकरण के काम हुए हैं, लेकिन प्रदूषण इन प्रयासों पर पानी फेर रहा है।


बढ़ता प्रदूषण: कारण और प्रभाव
रामगढ़ ताल में 11 से अधिक नाले सीधे गंदा पानी डाल रहे हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट्स में BOD और COD स्तर मानक से अधिक पाया गया है, जिससे ऑक्सीजन की कमी हो रही है। 2024 में हजारों मछलियां मरीं, जो प्रदूषण का स्पष्ट संकेत था। सिल्ट जमा होने से किनारे सूख रहे हैं, पानी हरा पड़ रहा है और बदबू फैल रही है। इससे मछुआरों की आजीविका खतरे में है, पर्यटन प्रभावित हो रहा है और आने वाली पीढ़ियां इसे केवल तस्वीरों में देखेंगी।

विश्व विजय सिंह का उपवास और जन आंदोलन
इस गंभीर समस्या के खिलाफ प्रदेश उपाध्यक्ष श्री विश्व विजय सिंह ने रामगढ़ ताल किनारे एक दिन का उपवास रखा। उन्होंने कहा, “रामगढ़ ताल नहीं रहेगा तो जश्न कहां मनाओगे?” यह सवाल हर गोरखपुरवासी के दिल को छू गया। उपवास में सैकड़ों लोग शामिल हुए, जिसमें युवा, महिलाएं, बुजुर्ग और विभिन्न वर्ग के लोग थे। फिशरमैन आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रभान निषाद ने खुला समर्थन दिया और पत्र देकर कहा कि ताल मछुआरा समाज की रोजी-रोटी है। फिशरमैन कांग्रेस और अन्य संगठनों ने भी साथ दिया। यह आंदोलन राजनीतिक नहीं, बल्कि गोरखपुर की आत्मा बचाने का है।
उन्होंने मांग की:
- सीवर और नालों का डिस्चार्ज तुरंत रोका जाए।
- प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सक्रिय हो।
- वैज्ञानिक तरीके से ताल की सफाई हो।
जनभागीदारी से बचेगा रामगढ़ ताल
कार्यक्रम में तय हुआ कि एक दिन का विरोध काफी नहीं। लगातार निगरानी,
सफाई में योगदान और सोशल मीडिया से अभियान चलाना जरूरी है।
आम जनता से अपील है कि प्लास्टिक कम करें, कचरा न फेंकें और जिम्मेदार एजेंसियों पर दबाव बनाएं।
सरकार ने सौंदर्यीकरण के लिए करोड़ों खर्च किए हैं, लेकिन प्रदूषण रोकना सबसे बड़ा चुनौती है।
रामगढ़ ताल गोरखपुर की धड़कन है। यदि सब मिलकर प्रयास करेंगे, तो
यह झील फिर से पूर्वांचल का मरीन ड्राइव बनेगी।
वरना “झील नहीं रहेगी तो जश्न कहां मनाओगे” कटु सच्चाई बन जाएगा।
आइए, आज से ही इस मुहिम में शामिल हों और अपनी झील को बचाएं।