गोरखपुर, 19 जनवरी 2026। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में स्थित रामगढ़ ताल एक बार फिर सुर्खियों में है। यहां लगातार मछलियां मर रही हैं, जिससे स्थानीय मछुआरा समुदाय और पर्यावरण प्रेमी चिंतित हैं। रामगढ़ ताल प्रदूषण की यह घटना न केवल जल जीवन को खतरे में डाल रही है, बल्कि पूरे क्षेत्र के भूमिगत जलस्तर को भी प्रभावित कर सकती है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश उपाध्यक्ष श्री विश्वविजय सिंह के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने गोरखपुर मंडल आयुक्त को ज्ञापन सौंपा है। आयुक्त की अनुपस्थिति में अपर आयुक्त जय प्रकाश को यह ज्ञापन दिया गया, जिसमें मछली मृत्यु के कारणों की तत्काल जांच की मांग की गई। विश्वविजय सिंह ने उपवास आंदोलन शुरू कर इस मुद्दे को और तेज किया है, जिससे गोरखपुर में बड़ा हंगामा मचा हुआ है। यह घटना गोरखपुर मछली मृत्यु के रूप में चर्चा का विषय बनी हुई है।
रामगढ़ ताल: गोरखपुर की अमूल्य प्राकृतिक धरोहर अब खतरे में
रामगढ़ ताल, जो गोरखपुर की एक अमूल्य प्राकृतिक धरोहर है, अब प्रदूषण की चपेट में फंस चुकी है। लगभग 723 हेक्टेयर (1800 एकड़) में फैला यह तालाब शहर का प्रमुख पर्यटन स्थल है, जिसे मरीन ड्राइव की तरह विकसित किया जा रहा है। यहां शिकारा, पैराग्लाइडिंग जैसी सुविधाएं हैं, लेकिन प्रदूषण ने इसकी सुंदरता पर बट्टा लगा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि तालाब में बहने वाले गंदे पानी और सीवेज के कारण ऑक्सीजन की कमी हो रही है, जिससे मछलियां मर रही हैं। पिछले वर्षों में भी ऐसी घटनाएं हुई हैं, जैसे 2024 में हजारों मछलियां मरीं, जहां उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ऑक्सीजन की कमी को प्रमुख कारण बताया।
विश्वविजय सिंह का उपवास आंदोलन और राजनीतिक हंगामा
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश उपाध्यक्ष विश्वविजय सिंह ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया है। उन्होंने प्रतिनिधिमंडल के साथ ज्ञापन सौंपा और मछली मृत्यु के कारणों की जांच, दोषियों पर कार्रवाई तथा ताल को प्रदूषण मुक्त करने की मांग की। विश्वविजय सिंह ने स्पष्ट कहा कि रामगढ़ ताल को बर्बाद करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने उपवास आंदोलन शुरू कर प्रदर्शन को तेज किया, जिससे गोरखपुर में बड़ा हंगामा मचा है। कांग्रेस कार्यकर्ता और स्थानीय लोग सड़कों पर उतर आए हैं। यह आंदोलन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, गोरखपुर विकास प्राधिकरण (जीडीए) और स्थानीय प्रशासन पर दबाव बढ़ा रहा है।
पहले भी 305 करोड़ से अधिक खर्च कर सौंदर्यीकरण की कोशिशें हुईं,
लेकिन नाले का पानी अभी भी गिर रहा है।
विश्वविजय सिंह का यह कदम पर्यावरण संरक्षण और राजनीतिक जागरूकता का प्रतीक बन गया है।
कारण और प्रभाव: पर्यावरणीय संकट की गहराई
प्रमुख कारण सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट का सीधा निर्वहन है, जिससे घुलित ऑक्सीजन कम हो जाता है।
बारिश के बाद तेज धूप से भी स्थिति बिगड़ती है। प्रभाव में मछलियों की मौत से लाखों का नुकसान,
मछुआरों की आजीविका प्रभावित, पर्यटन पर असर और भूमिगत जल प्रदूषित होने का खतरा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि तत्काल सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को प्रभावी बनाना और नालों को डायवर्ट करना जरूरी है।