उत्तर प्रदेश में RTE
हाईकोर्ट ने दिखाई RTE पर सख्ती, सरकार से मांगा पूरा ब्योरा
उत्तर प्रदेश में राइट टू एजुकेशन (RTE) एक्ट के तहत निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित तबके के बच्चों को 25% सीटों का आरक्षण मिलना चाहिए। लेकिन कई वर्षों से इस प्रक्रिया में अनियमितताओं, देरी और गड़बड़ियों की शिकायतें आती रही हैं।
15 जनवरी 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार पर सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि RTE एक संवैधानिक अधिकार है और कोई भी पात्र बच्चा इससे वंचित नहीं रहना चाहिए। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा की एकल पीठ ने राज्य सरकार, बेसिक शिक्षा विभाग और निजी स्कूलों से 2025-26 शैक्षणिक सत्र के RTE दाखिलों का पूरा ब्योरा मांगा।
कोर्ट ने कई सवाल उठाए:
- कितने बच्चों ने आवेदन किया?
- कितनों का दाखिला हुआ?
- कितने आवेदनों को अस्वीकार किया गया और क्यों?
- निजी स्कूलों ने कितनी सीटें आरक्षित रखीं और कितनी भरीं?
- क्या कोई स्कूल RTE कोटा पूरा नहीं कर रहा?
कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि अगली सुनवाई (फरवरी 2026 में) तक राज्य सरकार विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करे, जिसमें जिला-वार आंकड़े और अस्वीकृति के कारण भी शामिल हों।
RTE नियम क्या कहते हैं?
राइट टू एजुकेशन एक्ट 2009 के तहत गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूलों को कक्षा 1 में कुल सीटों का 25% आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS), अनाथ, विकलांग और अन्य वंचित बच्चों के लिए आरक्षित रखना अनिवार्य है। इन बच्चों को मुफ्त शिक्षा, किताबें, यूनिफॉर्म और मिड-डे मील मिलता है।
उत्तर प्रदेश में हर साल लगभग 4-5 लाख बच्चे RTE के तहत दाखिले के लिए आवेदन करते हैं, लेकिन वास्तविक दाखिले इस संख्या के 50-60% तक ही रहते हैं। कई निजी स्कूल RTE कोटा भरने से बचते हैं या फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अस्वीकार करते हैं।
हाईकोर्ट के निर्देशों का महत्व
यह सुनवाई एक जनहित याचिका (PIL) पर हुई, जिसमें याची ने आरोप लगाया था कि कई बड़े शहरों (लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, गोरखपुर, आगरा) में प्रतिष्ठित निजी स्कूल RTE कोटा पूरी तरह नहीं भर रहे। कोर्ट ने सरकार को चेतावनी दी कि यदि नियमों का पालन नहीं हुआ तो संबंधित स्कूलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी, जिसमें मान्यता रद्द करना भी शामिल है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि RTE न केवल शिक्षा का अधिकार है, बल्कि सामाजिक समानता और एकीकरण का माध्यम भी है। गरीब बच्चे निजी स्कूलों में पढ़कर बेहतर अवसर पाते हैं।
राज्य सरकार की तैयारी और अगले कदम
बेसिक शिक्षा विभाग ने कहा कि ऑनलाइन पोर्टल पर आवेदन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है
और दाखिला लॉटरी के माध्यम से हो रहा है।
विभाग जल्द ही कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल करेगा।
याची के वकील ने बताया कि कई मामलों में स्कूल फीस, दस्तावेज और दूरी जैसे कारणों से दाखिला रोकते हैं।
कोर्ट ने इन सभी बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है।
शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करने का वक्त
हाईकोर्ट की इस सख्ती से उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश में RTE के तहत पात्र बच्चों को उनका हक मिलेगा।
यह फैसला न केवल हजारों गरीब परिवारों के लिए राहत की बात है,
बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम भी है।
अब सबकी नजरें राज्य सरकार की रिपोर्ट और कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
आशा है कि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित नहीं रहेगा।
