ISRO के PSLV-C62 मिशन में बड़ा झटका
श्रीहरिकोटा, 12 जनवरी 2026 – भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) को आज एक बड़ा तकनीकी झटका लगा। श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से पीएसएलवी-सी62 रॉकेट का प्रक्षेपण सफलतापूर्वक हुआ, लेकिन तीसरे चरण में गंभीर तकनीकी समस्या आने से रॉकेट अपने निर्धारित कक्षा पथ से भटक गया। इस मिशन में भारत के स्वदेशी उपग्रह अन्वेषा (Anvesha) समेत कुल 15 उपग्रह (14 विदेशी + 1 भारतीय) लॉन्च करने की योजना थी।
रॉकेट का वजन करीब 260 टन था और यह PSLV-XL वेरिएंट का था। प्रक्षेपण दोपहर 2:47 बजे IST पर हुआ। पहले और दूसरे चरण सामान्य रूप से काम किए, लेकिन तीसरे चरण (PS3) में ठीक समय पर इग्निशन के बाद अचानक व्हीकल का नियंत्रण खो गया। टेलीमेट्री डेटा से पता चला कि रॉकेट ने अपेक्षित पिच और यॉ एंगल में बदलाव नहीं किया और तय ट्रैजेक्टरी से काफी विचलित हो गया।
इसरो चीफ का बयान
ISRO चेयरमैन एस. सोमनाथ ने तत्काल प्रेस ब्रीफिंग में कहा, “प्रक्षेपण के शुरुआती चरण सफल रहे, लेकिन तीसरे चरण में एक तकनीकी खराबी आई जिसके कारण व्हीकल रास्ते से भटक गया। हमारी टीम डेटा का गहन विश्लेषण कर रही है। फेलियर एनालिसिस कमेटी गठित कर दी गई है। हम जल्द ही कारणों का पता लगाकर सुधारात्मक कदम उठाएंगे। ISRO ने पहले भी ऐसी चुनौतियों का सामना किया है और हर बार मजबूत होकर वापस आया है।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रॉकेट में कोई विस्फोट नहीं हुआ, बल्कि यह नियंत्रण खोकर समुद्र में गिर गया। सभी 15 उपग्रहों को कक्षा में स्थापित नहीं किया जा सका।
मिशन का उद्देश्य क्या था?
अन्वेषा (Anvesha) भारत का पहला समर्पित क्लाइमेट मॉनिटरिंग सैटेलाइट था, जो ग्रीनहाउस गैसों, एयरोसोल, क्लाउड कवर और ओशन कलर की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग करने वाला था। इसके अलावा 14 अन्य उपग्रहों में सिंगापुर, कनाडा, अमेरिका और यूरोपीय देशों के छोटे-छोटे नैनो और माइक्रो सैटेलाइट शामिल थे, जो अर्थ ऑब्जर्वेशन, कम्युनिकेशन और टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन के लिए थे।
यह PSLV का 62वां मिशन था और ISRO की विश्वसनीयता के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा था।
PSLV ने अब तक 50 से अधिक मिशन सफलतापूर्वक पूरे किए थे
और इसकी सफलता दर 95% से अधिक रही है।
क्या प्रभाव पड़ेगा?
- अन्वेषा सैटेलाइट की हानि से भारत का क्लाइमेट चेंज मॉनिटरिंग प्रोग्राम प्रभावित होगा।
- इसे दोबारा लॉन्च करने में कम से कम 18-24 महीने लग सकते हैं।
- विदेशी ग्राहकों के उपग्रहों की विफलता से ISRO की कमर्शियल लॉन्चिंग पर भरोसा थोड़ा प्रभावित हो सकता है।
- PSLV-XL वेरिएंट के तीसरे चरण में यह पहली बड़ी विफलता है, जिससे इंजीनियर्स को नए सिरे से समीक्षा करनी होगी।
आगे की राह
ISRO ने पहले भी 1993 में PSLV-D1 और 2010 में GSLV-D3 जैसी विफलताओं से सीखा है
और मजबूत होकर लौटा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक अलग-थलग घटना है
और ISRO की टीम जल्द ही इसे ठीक कर लेगी।
संगठन ने लोगों से समर्थन और धैर्य की अपील की है।
यह घटना भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए चुनौतीपूर्ण है,
लेकिन ISRO की इतिहास गवाह है कि विफलता से सीखकर ही सफलता मिलती है।
जांच रिपोर्ट आने के बाद ही पूरी तस्वीर साफ होगी।