सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया गया: सीएम उमर अब्दुल्ला ने मोदी सरकार से की ये बड़ी मांग!
मेटा डिस्क्रिप्शन: सिंधु जल संधि 2025 में निलंबित होने के बाद जम्मू-कश्मीर सीएम उमर अब्दुल्ला ने मोदी सरकार से मांग की कि राज्य को पानी के संसाधनों का पूरा उपयोग करने की अनुमति दी जाए। जानिए पूरी खबर, पाहलगाम हमले का असर और भविष्य की परियोजनाएं!
परिचय: सिंधु जल संधि का निलंबन और उमर अब्दुल्ला की प्रतिक्रिया
जनवरी 2026 की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty – IWT) के निलंबन का स्वागत किया है। यह संधि, जो 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित हुई थी, अप्रैल 2025 में मोदी सरकार द्वारा निलंबित कर दी गई थी। निलंबन का मुख्य कारण पाहलगाम आतंकी हमला था, जिसमें 26 लोग, ज्यादातर पर्यटक, मारे गए थे।
उमर अब्दुल्ला ने कहा कि यह संधि लंबे समय से जम्मू-कश्मीर को नुकसान पहुंचा रही थी और राज्य के पानी के संसाधनों का उचित उपयोग नहीं होने दे रही थी। उन्होंने मोदी सरकार से बड़ी मांग की है कि अब राज्य को इन जल संसाधनों का पूरा फायदा दिया जाए। यह बयान ऐसे समय में आया है जब कश्मीर में पर्यटन और विकास परियोजनाओं पर फोकस बढ़ रहा है।
सिंधु जल संधि का इतिहास और निलंबन के कारण
सिंधु जल संधि विश्व बैंक की मध्यस्थता में 1960 में बनी थी, जिसमें सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, व्यास और सतलुज नदियों के पानी का बंटवारा तय किया गया। भारत को पूर्वी नदियों (रावी, व्यास, सतलुज) पर पूरा नियंत्रण मिला, जबकि पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) का बड़ा हिस्सा। लेकिन जम्मू-कश्मीर, जहां ये नदियां बहती हैं, को संधि से नुकसान हुआ क्योंकि राज्य को बिजली उत्पादन और सिंचाई के लिए पानी का सीमित उपयोग ही मिला।
अप्रैल 2025 में पाहलगाम हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने संधि को निलंबित करने का फैसला लिया। साथ ही अटारी बॉर्डर बंद कर दिया गया और पाकिस्तानी नागरिकों को वीजा पर रोक लगा दी गई। यह कदम भारत-पाकिस्तान संबंधों में बड़ा बदलाव था, जो आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख दिखाता है।
उमर अब्दुल्ला की मांग: “अब हमारा पानी हमें दें”
सीएम उमर अब्दुल्ला ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “सिंधु जल संधि ने हमें बहुत नुकसान पहुंचाया है। इसका निलंबन अच्छा है। अब ऐसे उपाय किए जाएं कि हम अपने पानी का उपयोग खुद कर सकें।” उन्होंने तुलबुल बैराज प्रोजेक्ट का जिक्र किया, जो झेलम नदी पर प्रस्तावित है और संधि के कारण रुका हुआ था। यह प्रोजेक्ट बिजली उत्पादन और सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण है।
उमर ने संधि का विरोध शुरू से किया था और कहा कि इससे जम्मू-कश्मीर का विकास बाधित हुआ।
उन्होंने मोदी सरकार से मांग की कि राज्य को चिनाब और झेलम नदियों
का पानी पूरी तरह उपयोग करने की अनुमति दी जाए,
जिससे बिजली संकट दूर होगा और अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। साथ ही,
उन्होंने राज्य की पर्यटन बहाली पर भी जोर दिया, जहां बर्फबारी के बाद पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है।
जम्मू-कश्मीर के लिए क्या फायदे?
संधि के निलंबन से जम्मू-कश्मीर को कई लाभ मिल सकते हैं:
- बिजली उत्पादन: राज्य में हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स तेजी से बन सकेंगे, जो वर्तमान में संधि की वजह से सीमित थे।
- सिंचाई और कृषि: किसानों को अधिक पानी मिलेगा, जिससे फसल उत्पादन बढ़ेगा।
- आर्थिक विकास: पानी के संसाधनों से रोजगार और निवेश बढ़ेगा।
- सुरक्षा: आतंकवाद के खिलाफ मजबूत कदम से क्षेत्र में शांति आएगी।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि निलंबन से पाकिस्तान के साथ तनाव बढ़ सकता है,
लेकिन भारत का रुख स्पष्ट है कि आतंकवाद और पानी अलग नहीं हैं।
निष्कर्ष: एक नया अध्याय की शुरुआत
उमर अब्दुल्ला की मांग सिंधु जल संधि के निलंबन को जम्मू-कश्मीर के लिए अवसर में बदलने की दिशा में है।
मोदी सरकार से अपेक्षा है कि राज्य की मांगों पर जल्द कार्रवाई हो।
यह फैसला न केवल पानी के बंटवारे पर असर डालेगा बल्कि भारत-पाक संबंधों को भी प्रभावित करेगा।
जम्मू-कश्मीर के लोगों को उम्मीद है