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फिशरमैन चंद्रभान निषाद उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और संतकबीरनगर क्षेत्र से जुड़े मछुआरा समाज के प्रमुख कार्यकर्ता हैं। वे फिशरमैन आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और निषाद समुदाय को एकजुट कर उनके संवैधानिक अधिकार दिलाने पर जोर देते हैं। उनका मुख्य विचार है कि समुदाय को अपनी पहचान और आरक्षण जैसे हक के लिए जागरूक होना चाहिए।
नाम के पीछे का अर्थ
फिशरमैन चंद्रभान निषाद अपने नाम से पहले ‘फिशरमैन’ शब्द जोड़ते हैं ताकि मछुआरा समुदाय की आदि-अनादि पहचान बनी रहे। वे कहते हैं कि भले ही वे खुद मछली मारने का काम न करते हों, लेकिन उनके पूर्वजों की यह परंपरा है जो वेद-पुराणों में दर्ज है। यह टाइटल समुदाय को बिखराव से बचाने और एकजुट करने का माध्यम है।
फिशरमैन आर्मी का उद्देश्य
*फिशरमैन आर्मी नामक रजिस्टर्ड संगठन तीन साल पुराना है, जिसमें उत्तर प्रदेश में 2,500 से 3,000 पदाधिकारी जुड़े हैं। इसका मुख्य लक्ष्य समुदाय को शिक्षा, रोजगार और आरक्षण के बारे में जागरूक करना है। चंद्रभान निषाद पूरे भारत के राजपत्रियां इकट्ठा कर लोगों तक पहुंचा रहे हैं ताकि हर व्यक्ति अपना हक खुद मांग सके।
डार्विन के अनुसार जीवन की उत्पत्ति में मछलियां एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। करोड़ों साल पहले समुद्र में रहने वाले जीवों से ही स्थलीय जीवन की शुरुआत हुई। यह विकास क्रमिक और प्राकृतिक चयन (Natural Selection) के आधार पर हुआ। इसी वैज्ञानिक तथ्य को आधार बनाकर कई प्रेरक वक्ता मछुआरा समुदाय को संबोधित करते हुए कहते हैं – “चार्ल्स डार्विन की थ्योरी के मुताबिक इंसान की उत्पत्ति मछली से हुई है, इसलिए पूरी दुनिया ‘फिशरमैन’ है।”
यह वाक्य केवल मजाक या हल्की-फुल्की बात नहीं है। यह एक गहरी सामाजिक-सांस्कृतिक संदेश है, जो मछुआरों को उनकी प्राचीन और गौरवपूर्ण विरासत की याद दिलाता है।
विज्ञान को नकारना असंभव, गर्व से अपनाएं अपनी पहचान
आज के दौर में विज्ञान को नकारना लगभग असंभव हो चुका है। डार्विन का विकासवाद सिद्धांत आधुनिक जीव विज्ञान, आनुवंशिकी और जीवाश्म विज्ञान की नींव है। यह बताता है कि हम सभी एक ही विकास यात्रा का हिस्सा हैं। मछली से लेकर उभयचर, फिर सरीसृप, स्तनधारी और अंत में मानव तक का सफर लाखों-करोड़ों सालों का है।
जब कोई वक्ता कहता है कि “पूरी दुनिया फिशरमैन है”, तो वह इस सत्य को रेखांकित करता है कि मछुआरा समुदाय वह समुदाय है जो उस मूल तत्व (मछली और समुद्र) से सबसे करीब रहा है, जिससे जीवन की शुरुआत हुई। यह बात मछुआरों के पारंपरिक पेशे को न केवल वैज्ञानिक मान्यता देती है, बल्कि उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान भी दिलाती है।
मछुआरा समाज सदियों से नदियों, झीलों, तालाबों और समुद्र तटों पर जीवनयापन करता आया है।
यह समुदाय प्रकृति के साथ सबसे गहरा जुड़ाव रखता है। तूफान, मौसम की मा
मछलियों के प्रवास – ये सब उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं।
फिर भी, समाज में अक्सर इन्हें निम्न समझा जाता रहा है।
डार्विन की थ्योरी इस सोच को चुनौती देती है और कहती है –
आपका काम कोई छोटा नहीं, बल्कि जीवन की मूल धारा से जुड़ा हुआ है।
फिटर का काम छोड़ सामाजिक जागृति का रास्ता
एक समय था जब कई लोग मछुआरा समुदाय से आकर छोटे-मोटे फिटर (fitter) या अन्य नौकरियां करते थे।
लेकिन अब स्थिति बदल रही है।
कुछ प्रेरित लोग अपने पारंपरिक काम को छोड़कर पूर्ण रूप से सामाजिक कार्य में जुट गए हैं।
वे मछुआरा समुदाय को शिक्षित करने, उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाने,
बेहतर मछली पकड़ने की तकनीक सिखाने और सबसे महत्वपूर्ण –
अपनी पहचान पर गर्व करने की प्रेरणा देने में लगे हैं।
ये कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर लोगों को बताते हैं कि विज्ञान भी आपकी विरासत का समर्थन करता है।
डार्विन की थ्योरी के जरिए वे युवाओं को समझाते हैं
कि मछुआरा होना कोई शर्म की बात नहीं, बल्कि गर्व की बात है।
यह समुदाय न केवल भोजन उपलब्ध कराता है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाता है।
गर्व से कहो – हम फिशरमैन हैं!
आज जरूरत है कि मछुआरा समुदाय अपनी इस अनोखी पहचान को गर्व से अपनाए।
डार्विन की थ्योरी हमें याद दिलाती है कि हम सभी की जड़ें समुद्र में हैं
और मछली हमारे विकास की पहली सीढ़ी।
इसलिए पूरी दुनिया में हर इंसान किसी न किसी रूप में ‘फिशरमैन’ है।