मथुरा में गोसेवा ट्रस्ट के नाम पर खाता खुलवाकर 21 करोड़ की साइबर ठगी
संवाददाता की विशेष रिपोर्ट
- मथुरा में घटित एक सनसनीखेज साइबर अपराध ने पूरे देश को हिला दिया है।
- इस अपराध में गोसेवा ट्रस्ट का नाम लेकर भारतीय स्टेट बैंक की कैट शाखा में खाता खोला गया।
- खाते के जरिए महज दस दिन के भीतर 21 करोड़ रुपये की ठगी को अंजाम दिया गया।
- ठगों ने बैंक और सिस्टम की खामियों का फायदा उठाते हुए पूरी रकम अलग-अलग खातों में स्थानांतरित कर दी।
- घटना उजागर होने पर पुलिस हरकत में आई और दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया।
- मामले की जांच साइबर थाना मथुरा और नेशनल साइबर क्राइम रिकॉर्ड पोर्टल की मदद से आगे बढ़ रही है।
- यह मामला देश के उन सबसे बड़े ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड्स में शामिल हो गया है जिनका खुलासा हाल ही में हुआ है।
- रिपोर्ट में सामने आया है कि ठगी के लिए फर्जी ट्रस्ट का सहारा लिया गया।
- धार्मिक भावनाओं से जुड़े “गोसेवा ट्रस्ट” नाम का इस्तेमाल कर अपराधियों ने आसानी से बैंक को झांसा दिया।
- खाता खोलते समय प्रस्तुत किए गए दस्तावेज नकली थे।
- इस खाते को तीन लोगों ने संयुक्त नाम से संचालित किया।
- इन तीनों के नाम गौतम उपाध्याय, शिवम कुमार और गोविंद कुमार बताए गए हैं।
- तीनों ने खुद को “शिव गोरा गोसेवा ट्रस्ट मथुरा” का जिम्मेदार सदस्य बताकर खाता खुलवाया।
- खाता 27 अगस्त 2025 को आधिकारिक रूप से सक्रिय किया गया।
- शुरुआत में खाते में सामान्य लेन-देन किए गए ताकि बैंक को संदेह न हो।
- लेकिन 4 से 6 सितंबर के बीच अचानक बड़े पैमाने पर ट्रांजैक्शन शुरू हुए।
- विभिन्न स्रोतों से लगभग 21 करोड़ रुपये इस खाते में जमा कराए गए।
- रकम आते ही इसे तुरंत अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर दिया गया।
- खाते में केवल सात लाख रुपये शेष छोड़े गए।
- बाकी की राशि का कोई अता-पता नहीं रहा।
- जब लेन-देन की शिकायतें नेशनल साइबर क्राइम रिकॉर्ड पोर्टल (एनसीआरपी) पर दर्ज हुईं, तब मामला गंभीर बना।
- पोर्टल पर कुल 141 शिकायतें दर्ज की गई थीं।
- इनमें से दस दिनों के भीतर 19 राज्यों से लगातार संदेश आ रहे थे।
- पीड़ितों ने बताया कि उनके पैसे “गोसेवा ट्रस्ट” नामक खाते में ट्रांसफर हो गए।
- इनमें राजस्थान, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे राज्य शामिल थे।
- कई लोग दान या सामाजिक काम के नाम पर ठगे गए।
- कुछ लोग सरकारी स्कीम से जुड़े भुगतान में फंसाए गए।
- वहीं कई व्यापारियों से नकली इनवॉइस बनाकर रकम ट्रांसफर कराई गई।
- साइबर ठगों ने हर बार गोसेवा ट्रस्ट का नाम सामने रखा।
- इस वजह से लोगों को धोखे का संदेह नहीं हुआ।
- जैसे ही मामला साइबर थाना मथुरा तक पहुंचा, पुलिस ने तत्काल जांच शुरू कर दी।
- पुलिस टीम ने बैंक पहुंचकर खाते की पूरी जानकारी खंगाली।
- बैंक रिकॉर्ड में साफ लिखा मिला कि यह खाता एक ट्रस्ट के नाम से खोला गया है।
- खाते के दस्तावेज देखकर बैंक अधिकारी भी हैरान रह गए।
- दस्तावेजों में फर्जी आधार कार्ड, पैन कार्ड और ट्रस्ट रजिस्ट्रेशन पेपर शामिल थे।
- पहली नजर में यह सब असली प्रतीत हो रहा था।
- जांच गहराई से करने पर खुलासा हुआ कि दस्तावेज पूरी तरह नकली हैं।
- पुलिस ने जब संदिग्धों की तलाश की तो गौतम उपाध्याय और बल्देव सिंह नामक आरोपी पकड़े गए।
- दोनों को शनिवार रात छापेमारी कर गिरफ्तार किया गया।
- उनके पास से लैपटॉप, मोबाइल, सिम कार्ड और कई फर्जी कागजात बरामद किए गए।
- पूछताछ के दौरान दोनों ने अपराध स्वीकार कर लिया।
- उन्होंने बताया कि यह पूरा खेल संगठित गिरोह का हिस्सा है।
- गिरोह के लोग अलग-अलग राज्यों में फैले हुए हैं।
- यह नेटवर्क न केवल बैंक खाते खुलवाता है, बल्कि पैसों की हेराफेरी का पूरा तंत्र चलाता है।
- पुलिस को शक है कि कुछ रकम क्रिप्टोकरेंसी के जरिए विदेश भी भेजी गई है।
- इसके अलावा हवाला कारोबारियों के जरिए कैश लेन-देन भी किया गया।
- पुलिस ने संबंधित आईपी एड्रेस और लेन-देन की लोकेशन ट्रेस करनी शुरू कर दी है।
- बैंक से जुड़े सभी कर्मचारियों से भी पूछताछ की जा रही है।
- यह देखने के लिए कि खाता खुलने में कहीं अंदरूनी मिलीभगत तो नहीं रही।
- बैंक ने आंतरिक जांच समिति गठित कर दी है।
- समिति जांच कर रही है कि इतनी बड़ी रकम के लेन-देन के बावजूद सिस्टम ने अलर्ट क्यों नहीं दिया।
- आमतौर पर 50 लाख से ज्यादा के संदिग्ध लेन-देन पर तुरंत चेतावनी मिलती है।
- लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।
- विशेषज्ञों का मानना है कि यह बैंकिंग सिस्टम की बड़ी चूक है।
- अगर समय पर अलर्ट आता तो 21 करोड़ रुपये का नुकसान रोका जा सकता था।
- पुलिस अब इस मामले को बड़े साइबर अपराध की श्रेणी में देख रही है।
- अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं साइबर सुरक्षा की खामियों को उजागर करती हैं।
- देशभर में लगातार ऐसे मामले बढ़ रहे हैं।
- लेकिन पहली बार धार्मिक ट्रस्ट के नाम पर इतनी बड़ी ठगी सामने आई है।
- इससे आम लोगों में भी गहरी चिंता फैल गई है।
- साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि अपराधियों ने बहुत ही सोची-समझी रणनीति अपनाई।
- सबसे पहले धार्मिक नाम का सहारा लिया गया।
- फिर नकली दस्तावेज तैयार कर बैंक को भ्रमित किया गया।
- खाते में शुरुआत में छोटे ट्रांजैक्शन किए गए।
- जब बैंक निश्चिंत हो गया तो अचानक करोड़ों रुपये जमा कराए गए।
- रकम आने के तुरंत बाद उसे अलग-अलग खातों में बांट दिया गया।
- इससे पुलिस और बैंक को रकम ट्रेस करने में मुश्किल हुई।
- रकम की एक बड़ी हिस्सेदारी उत्तर भारत के अलग-अलग खातों में भेजी गई।
- वहीं कुछ राशि दक्षिण भारत के खातों में गई।
- इसके अलावा ऑनलाइन वॉलेट्स और विदेशी खातों में भी लेन-देन दर्ज हुआ।
- विशेषज्ञों का कहना है कि यह ठगी एक “मनी लॉन्ड्रिंग” जैसा केस भी बन सकता है।
- पुलिस अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से भी सहयोग ले सकती है।
- क्योंकि रकम का इस्तेमाल अवैध कारोबारों में होने की आशंका है।
- पुलिस ने इंटरपोल को भी अलर्ट किया है।
- अगर रकम विदेश गई है तो वहां से जानकारी जुटाना जरूरी होगा।
- इस पूरे प्रकरण ने साइबर अपराधियों की चालाकी उजागर कर दी है।
- यह मामला उन लोगों के लिए सबक है जो आंख मूंदकर दान या ट्रांजैक्शन कर देते हैं।
- बैंक उपभोक्ताओं को भी सतर्क रहने की सलाह दी गई है।
- किसी भी ट्रस्ट या संस्था को पैसा भेजने से पहले उसकी वैधता जांचनी चाहिए।