भारतीय राजनीति में हाल के दिनों में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जब देश के विभिन्न वर्गों से जुड़ी 272 प्रतिष्ठित हस्तियों — जिनमें से कई पूर्व जज, नौकरशाह, सेना अधिकारी, शिक्षाविद और राजनयिक रह चुके हैं — ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को एक खुला पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने देश के मौजूदा हालात पर चिंता जताई है और राहुल गांधी से आग्रह किया है कि वे “भारत के लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा” के लिए अपनी भूमिका और मजबूत करें।
यह पत्र पिछले सप्ताह जारी हुआ और रविवार को सार्वजनिक रूप से सामने आया। हस्ताक्षरकर्ताओं में सुप्रीम कोर्ट तथा कई हाईकोर्टों के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) व भारतीय विदेश सेवा (IFS) के वरिष्ठ अधिकारी, रिटायर्ड सेना अफसर, विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं।
इस समूह ने खुद को “भारत के संविधान में आस्था रखने वाले नागरिक” बताया है।क्या लिखा है पत्र मेंपत्र में लिखा गया है कि वर्तमान शासन व्यवस्था में लोकतांत्रिक संस्थानों पर खतरा बढ़ता जा रहा है। कई संवैधानिक संस्थाएँ, न्यायपालिका से लेकर स्वतंत्र प्रेस तक, भय और दबाव के माहौल में कार्य करने को विवश हैं। पत्र में कहा गया, “हम भारत के नागरिक के रूप में गहराई से चिंतित हैं कि हमारे संविधान की भावना कमजोर की जा रही है, और असहमति की आवाज़ों को राष्ट्रविरोध या अपमान जैसी संज्ञा दी जा रही है।
”हस्तियों ने राहुल गांधी की “भारत जोड़ो यात्रा” और “भारत जोड़ो न्याय यात्रा” जैसी पहलों की सराहना करते हुए लिखा कि उन्होंने देश को जोड़ने और लोगों तक पहुँचने की राजनीति को नई दिशा दी है। पत्र में यह भी कहा गया कि विपक्ष के पास अब संविधान की रक्षा और सामाजिक एकता को बनाए रखने की बड़ी जिम्मेदारी है।
हस्ताक्षर करने वालों में कौन-कौनपत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में से कुछ प्रमुख नाम सामने आए हैं — पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस मदन बी. लोकुर, पूर्व विदेश सचिव शिवशंकर मेनन, रिटायर्ड नौकरशाह व आयुक्त हरश मंदर, पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल विष्णु भागवत, पूर्व राजदूत नीरुपमा राव और कई जाने-माने शिक्षाविदों के नाम सूची में शामिल हैं।
पत्र पर साइन करने वालों ने किसी भी राजनीतिक दल से सीधा जुड़ाव न होने की बात कही है, लेकिन उन्होंने माना कि राहुल गांधी विपक्ष में एक ऐसी आवाज़ हैं जो लगातार “जनहित, न्याय और समानता” की बात कर रहे हैं। कई हस्तियों का यह भी मानना है कि भारत को एक मजबूत वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टि की जरूरत है जो “डर की राजनीति” को चुनौती दे सके।
पत्र का राजनीतिक और सामाजिक संदर्भदेश के राजनीतिक माहौल में यह पत्र ऐसे समय आया है जब संसद में विपक्षी दलों को “भारत गठबंधन” के रूप में एकजुट करने की कोशिशें तेज हुई हैं। राहुल गांधी की हालिया यात्राओं ने जमीनी स्तर पर लोगों से सीधा संवाद बढ़ाया है, जिससे विपक्षी राजनीति में नई ऊर्जा दिख रही है।पत्र में यह भी लिखा गया है कि भारत की विविधता, धर्मनिरपेक्षता और समानता के सिद्धांतों को लेकर “संगठित प्रयासों से चोट पहुंचाई जा रही है।
” इसमें कहा गया कि सरकार से असहमति व्यक्त करते ही व्यक्ति को राष्ट्रद्रोही या विदेशी एजेंडा चलाने वाला बताया जा रहा है, जो किसी स्वस्थ लोकतंत्र में उचित नहीं है।राहुल गांधी की प्रतिक्रियापत्र सामने आने के बाद राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर इसका जवाब दिया और लिखा कि “यह पत्र भारत की आत्मा की आवाज़ है।” उन्होंने उन सभी हस्तियों का आभार व्यक्त किया जिन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की बात की।
राहुल गांधी ने कहा कि वे इस नैतिक समर्थन को अपने संघर्ष की शक्ति मानते हैं और आगे भी “नफरत के खिलाफ प्रेम और सच्चाई की राजनीति” करते रहेंगे।भाजपा और सरकार की प्रतिक्रियासत्ता पक्ष ने इस पत्र को “राजनीतिक रूप से प्रेरित” बताया। भाजपा नेताओं का कहना है कि यह पत्र दरअसल कांग्रेस के राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश है।
भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि “राहुल गांधी को समर्थन देने वाले ये वही लोग हैं जो पहले भी विपक्षी एजेंडे के पक्ष में खुलकर बोलते रहे हैं।”कुछ सरकारी सूत्रों ने कहा कि “लोकतांत्रिक संस्थान पहले से अधिक मजबूत हुए हैं” और न्यायपालिका व मीडिया स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं। पत्र को चुनावी वर्ष की राजनीतिक रणनीति भी माना जा रहा है, क्योंकि कुछ महीनों में कई बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।
विशेषज्ञों की रायराजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पत्र अपने आप में एक प्रतीकात्मक कदम है, जिसका उद्देश्य विपक्ष और नागरिक समाज को एक मंच पर लाना है। प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने कहा कि “यह पत्र दिखाता है कि भारतीय लोकतंत्र के प्रति संवेदनशील तबका अब मौन नहीं रहना चाहता।”कुछ विशेषज्ञों ने यह भी जोड़ा कि इस प्रकार की पहल आमतौर पर सरकार को सीधे प्रभावित नहीं करती, लेकिन यह जनभावना और विमर्श के स्तर पर असर डालती है।
सोशल मीडिया पर भी इस पत्र को लेकर तीखी बहस चल रही है, जहाँ एक पक्ष इसे “लोकतंत्र का समर्थन” बता रहा है तो दूसरा इसे “विपक्षी राजनीति का प्रचार” कह रहा है।निष्कर्षकुल मिलाकर, 272 प्रतिष्ठित हस्तियों का यह पत्र भारत की राजनीति में एक महत्वपूर्ण सन्देश देता है। यह केवल राहुल गांधी के समर्थन में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की मांग करता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक हलकों में नई हलचल पैदा कर दी है और यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले महीनों में इसका असर विपक्षी एकता और राष्ट्रीय राजनीति पर कैसे पड़ता है।