उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2 से 3000 स्कूलों का आपस में विलय (मर्जर) करने का फैसला प्रदेश भर में चिंता और निराशा का कारण बन गया है। यह निर्णय शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है, लेकिन इसका असर दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में पढ़ रहे बच्चों और शिक्षकों पर गहरा पड़ सकता है।
सरकार का तर्क है कि जहां छात्र संख्या कम है, वहां स्कूलों को पास के स्कूल में मिलाकर संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। इस योजना के अंतर्गत लगभग 3000 प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्कूलों को मिलाकर एकीकृत विद्यालय बनाए जाएंगे। प्रशासन का दावा है कि इससे शैक्षिक गुणवत्ता, संसाधनों की उपलब्धता और निगरानी में सुधार होगा। हालांकि, इसकी हकीकत इससे अलग दिख रही है।
ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में पहले से ही बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर (Dropout Rate) अधिक है। अब जब उन्हें दूरस्थ स्कूलों में जाना पड़ेगा, तो यह दर और भी बढ़ सकती है। कई बच्चे खासकर प्राथमिक स्तर के छोटे विद्यार्थी, जो अपने गांव में ही स्कूल जाने के अभ्यस्त हैं, वे लंबी दूरी तय करने में असमर्थ होंगे। इससे उनकी पढ़ाई छूट सकती है।
दूसरी ओर, महिला शिक्षिकाएं, जो स्थानीय स्कूलों में काम करती थीं, उन्हें अब दूर स्थित स्कूलों में भेजा जा रहा है। यह न केवल उन्हें असुविधा में डालेगा बल्कि कई महिला शिक्षक इससे हतोत्साहित भी हो रही हैं।
इसके अलावा, स्कूल विलय से गांवों की पहचान, सामाजिक संरचना और शैक्षिक आत्मनिर्भरता पर भी आघात हो सकता है। छोटे स्कूल सिर्फ पढ़ाई का स्थान नहीं होते, वे बच्चों के सामाजिक विकास और ग्रामीण समुदाय के विश्वास का केंद्र होते हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों और अभिभावकों का कहना है कि सरकार को केवल आंकड़ों पर नहीं, ज़मीनी सच्चाई पर ध्यान देना चाहिए। स्कूलों की संख्या घटाने की बजाय उनमें गुणवत्ता सुधारने और शिक्षकों की नियुक्ति जैसे उपायों पर बल देना चाहिए।
यह कदम अगर बिना पर्याप्त योजना और संवाद के उठाया गया तो यह शिक्षा के अधिकार (RTE) जैसे कानून की मूल भावना को ही कमजोर करेगा। बच्चों को गुणवत्तापूर्ण, सुलभ और सुलभ शिक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है, न कि सुविधाजनक प्रशासनिक फैसलों से उन्हें शिक्षा से दूर करना।
निष्कर्षतः, यह फैसला दूरदर्शी कम और निराशाजनक अधिक प्रतीत होता है।
