दीपदान एक अत्यंत पुण्यकारी और धार्मिक परंपरा है, जिसे मुख्यतः कार्तिक मास में विशेष रूप से किया जाता है। इसका उद्देश्य अंधकार को दूर कर जीवन में प्रकाश, समृद्धि और शुद्धता लाना है।
‘दीपदान’ का अर्थ है दीपक का दान करना या दीपक जलाकर देव स्थान, मंदिर, नदी किनारे, तुलसी के पास या पवित्र स्थान पर रखना। यह न केवल एक पूजा कर्म है,
बल्कि यह ज्ञान और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है
।क्यों मनाया जाता है दीपदानधार्मिक ग्रंथों जैसे
पद्मपुराण और अग्निपुराण में दीपदान का विशेष महत्व बताया गया है। कार्तिक मास में सूर्य अपनी नीच राशि तुला में होता है, जिससे वातावरण में अंधकार और जड़ता बढ़ती है
ऐसे समय में दीपक जलाना प्रतीकात्मक रूप से प्रकाश और धर्म के मार्ग को अपनाने का संकेत है दीपदान करने से जीवन के अंधकार, पाप और बाधाएँ दूर होती हैं और व्यक्ति को देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।
यह कार्य आत्मा की शुद्धि, धन-समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति के लिए किया जाता है दीपदान के धार्मिक कारणदेवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए।अकाल मृत्यु से रक्षा और पितरों की सद्गति हेतु।यम, शनि, राहु, केतु के बुरे प्रभाव से मुक्ति के लिए।गृहकलह और संकटों से बचाव के लिए।
जीवन में प्रकाश, सफलता और शांति लाने के लिए
कब और कहाँ किया जाता है
दीपदानदीपावली, कार्तिक अमावस्या, पूर्णिमा, नरक चतुर्दशी, और यम द्वितीया के दिन।मंदिरों, पवित्र नदियों के किनारे, तुलसी पौधे के पास और घर के आंगन में।कार्तिक मास की रमा एकादशी से दीपावली तक के पाँच दिन विशेष शुभ माने जाते हैं, जिनमें किया गया दीपदान अक्षय फल देने वाला होता है
।आध्यात्मिक महत्वदीपदान का तात्पर्य केवल भौतिक प्रकाश से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण से है। यह धर्म, भक्ति और ज्ञान का प्रतीक है। दीपक की ज्योति व्यक्ति को यह सिखाती है कि जैसे वह स्वयं जलकर दूसरों को रोशनी देती है
, वैसे ही हमें भी जीवन में अच्छाई और सेवा का प्रकाश फैलाना चाहि ।इस प्रकार, दीपदान एक साधना है जो जीवन में नकारात्मकता को मिटाकर सुख, शांति, समृद्धि और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।