वित्तीय कारणों से कर्मियों का नियमितीकरण नहीं रोक सकते
उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग में लंबे समय से कार्यरत दैनिक कर्मियों को 24 अप्रैल, 2002 से नियमित करने का आदेश
– राजीव सिन्हा
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि वित्तीय बाधाओं के दरशोंहिसे लगातार या स्थायी काम कर रहे कर्मियों को वैध नियमितीकरण से वंचित करने के लिए ताबीज की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अस्थायी कर्मचारियों को कामकाज की तकनीकीताओं व शोषण तंत्र प्रशासन की विफलता का परिणाम है।
शाखा अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग में लंबे समय से कार्यरत दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को 24 अप्रैल, 2002 से नियमित करने का आदेश दिया। इसमें कहा गया कि हाईकोर्ट ने पहली बार मामले पर सुनवाई करते हुए सेवा नियमावली लागू कर नियुक्तियों को वैध ठहराया था।
तीन महीने में बकाया वेतन, पेंशन देने का आदेश
कोर्ट ने कहा, इसी तर्ज पर अन्य समान पदस्थ कर्मचारियों को पहले ही नियमित कर लिया गया, जबकि अपीलकर्ता दैनिक वेतनभोगी के रूप में कार्यरत रहे। यह मनमानी को उजागर करता है। लिहाजा सभी अपीलकर्ताओं का नियमितीकरण किया जाए। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया, अपीलकर्ताओं को वेतन वृद्धि के साथ नियमित वेतनमान में रखा जाए। सभी का बकाया वेतन तीन माह में अदा किया जाना चाहिए। अपीलकर्ताओं के लिए पेंशन व सेवानिवृत्त लाभ राशि की गणना भी की जानी चाहिए।
30 वर्षों की सेवा पर भी नहीं हुए स्थायी
धर्म सिंह और अन्य की ओर से दायर याचिका छः अपीलकर्ताओं से संबंधित थी, जिन्होंने 1989 से 1992 के बीच चपरासी और ड्राइवर के तौर पर कार्य शुरू किया था। 30 वर्षों से अधिक की निरंतर सेवा के बावजूद, उनकी स्थिति दैनिक वेतनभोगी या निश्चित मानदेय कर्मचारियों जैसी ही रही, जिन्हें नियमित पदों का लाभ नहीं मिला और केवल 1,500 से 2,000 रुपये प्रतिमाह मिलते रहे। उन्हें राहत देते हुए कोर्ट ने कहा कि इन कर्मचारियों को सुनकर, पूर्ण नियमितीकरण, तत्पश्चात वित्तीय लाभ और अनुपालन का शपथपत्र देने की योजना बने।
अदालत ने कहा
फैसले में इस पर जोर दिया कि राज्य (केंद्र व राज्य सरकारें) सिर्फ बाजार भागीदार नहीं हैं, बल्कि सांविधानिक नियोक्ता हैं। वह उन लोगों के भरोसे चलते हैं, जो सरकारी संस्थानों व सेवाओं को मजबूती प्रदान करते हैं और आम जनता को सुविधाएं देते हैं। अदालत ने कहा, जहां नियुक्ति निष्पक्ष हो व कानूनी आधार रखती हो, वहां वित्तीय तंगी को बहाना नहीं बनाया जा सकता। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि तदर्थवाद व मनमानी नियुक्तियां अक्सर स्थानीय प्रशासन अपारदर्शिता व भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती हैं और कर्मचारियों के शोषण के विकल्प पर आधारित होती हैं।