ट्रंप ने दिया भारतीय पेशेवरों को बड़ा झटका – एच-1बी वीजा शुल्क में भारी बढ़ोतरी
न्यूयॉर्क/वॉशिंगटन/नई दिल्ली।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से भारतीय पेशेवरों को बड़ा झटका दिया है। ट्रंप प्रशासन ने घोषणा की है कि एच-1बी वीजा के लिए अब हर साल लगभग 88 लाख रुपये का शुल्क देना होगा। यह शुल्क केवल नए आवेदनों पर लागू होगा। पुराने वीजा धारकों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।
- एच-1बी वीजा अमेरिका में नौकरी करने का सबसे बड़ा जरिया माना जाता है।
- हर साल हजारों भारतीय इस वीजा के लिए आवेदन करते हैं।
- आईटी सेक्टर से जुड़े अधिकतर पेशेवर इसी वीजा के जरिए अमेरिका पहुंचते हैं।
- अब शुल्क में की गई इस भारी बढ़ोतरी से भारतीयों पर बड़ा असर पड़ने वाला है।
- ट्रंप प्रशासन ने इस फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा और अमेरिकी युवाओं के रोजगार से जोड़ा है।
- उनका कहना है कि विदेशी पेशेवर अमेरिकी नागरिकों की नौकरियां छीन रहे हैं।
- शुल्क बढ़ाने से विदेशी कंपनियां कम संख्या में आवेदन करेंगी।
- इसका सीधा फायदा अमेरिकी युवाओं को मिलेगा।
- लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इस फैसले से अमेरिका की टेक इंडस्ट्री को भी नुकसान होगा।
- भारतीय पेशेवर अमेरिका की आईटी ग्रोथ में बड़ी भूमिका निभाते आए हैं।
- गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न जैसी कंपनियां भारतीयों पर काफी निर्भर करती हैं।
- ट्रंप का फैसला इन कंपनियों के लिए भी मुश्किलें खड़ी करेगा।
- भारतीय आईटी कंपनियां जैसे टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और टेक महिंद्रा अमेरिका में बड़े पैमाने पर प्रोजेक्ट्स करती हैं।
- अब इन कंपनियों को हर कर्मचारी पर करोड़ों का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा।
- इससे उनके मुनाफे पर सीधा असर पड़ेगा।
- भारत के स्टार्टअप और मध्यम आकार की कंपनियों के लिए यह झटका और बड़ा साबित होगा।
- वे इतनी भारी रकम चुकाने में सक्षम नहीं होंगी।
- इससे छोटे स्तर के पेशेवरों के सपनों को तगड़ा धक्का लगेगा।
- कई युवा जिन्होंने अमेरिका जाने की तैयारी कर रखी थी, अब दोबारा सोचने को मजबूर होंगे।
- नई नीति 21 सितंबर से लागू हो गई है।
- एच-1बी वीजा के लिए हर साल 85,000 आवेदन स्वीकार किए जाते हैं।
- इनमें से 70% से ज्यादा भारतीयों के पास जाते हैं।
- भारत से हर साल लगभग 3.2 लाख आवेदन किए जाते हैं।
- इनमें से लाखों को छांटकर ही वीजा दिया जाता है।
- ट्रंप प्रशासन का कहना है कि भारी शुल्क लगाने से अनावश्यक आवेदन रुकेंगे।
- केवल वही कंपनियां आवेदन करेंगी जिनकी वास्तव में जरूरत होगी।
- इस तरह अमेरिकी युवाओं को ज्यादा मौके मिलेंगे।
- हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय पेशेवरों की कमी अमेरिका की इंडस्ट्री को पीछे धकेल सकती है।
- भारत से जाने वाले इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अहम योगदान देते हैं।
- अगर उनकी संख्या कम होगी तो अमेरिका की ग्रोथ भी प्रभावित होगी।
- भारतीय आईटी कंपनियां पहले से ही वैश्विक प्रतिस्पर्धा में दबाव झेल रही हैं।
- अब यह नया नियम उनके लिए बोझ बढ़ा देगा।
- कंपनियों को तय करना होगा कि किस कर्मचारी को भेजा जाए और किसे नहीं।
- केवल जरूरी और कुशल पेशेवर ही अमेरिका भेजे जाएंगे।
- इससे बाकी लोगों के मौके सीमित हो जाएंगे।
- भारत में बेरोजगारी की समस्या और गहरी हो सकती है।
- लाखों युवा जो विदेश में नौकरी का सपना देखते हैं, उन्हें झटका लगेगा।
- वहीं अमेरिका में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों पर भी असर होगा।
- उन्हें पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी पाना और कठिन लगेगा।
- क्योंकि कंपनियां हर कर्मचारी पर इतना बड़ा खर्च करने से पहले सौ बार सोचेंगी।
- ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी जरूरी है।
- उनका दावा है कि विदेशी कंपनियां वीजा का गलत इस्तेमाल करती हैं।
- कई कंपनियां सस्ते श्रमिक भेजकर अमेरिकी मार्केट में अनुचित प्रतिस्पर्धा पैदा करती हैं।
- नए शुल्क से ऐसी प्रवृत्ति पर रोक लगेगी।
- ट्रंप ने इसे अमेरिका फर्स्ट नीति का हिस्सा बताया।
- उन्होंने कहा कि अमेरिकी युवाओं को प्राथमिकता देना ही उनका उद्देश्य है।
- ट्रंप ने यह भी कहा कि भारत समेत अन्य देशों के साथ संबंध प्रभावित नहीं होंगे।
- यह केवल रोजगार से जुड़ा कदम है।
- लेकिन भारतीय विशेषज्ञ इसे एकतरफा फैसला मानते हैं।
- उनका कहना है कि अमेरिका ने भारतीय पेशेवरों को अवसर देकर खुद भी फायदा उठाया है।
- भारतीय आईटी सेक्टर ने पिछले दो दशकों में अमेरिका की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई दी है।
- गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों के सीईओ भी भारतीय मूल के हैं।
- यह साबित करता है कि भारतीय प्रतिभा अमेरिका की मजबूती है।
- ऐसे में ट्रंप का फैसला दोनों देशों के रिश्तों को ठंडा कर सकता है।
- भारतीय कंपनियों को अब यूरोप, दुबई, सिंगापुर जैसे नए बाजार तलाशने होंगे।
- वे अमेरिकी निर्भरता कम करने की दिशा में कदम उठा सकती हैं।
- लेकिन निकट भविष्य में झटका सबसे ज्यादा लगेगा।
- कंपनियों की बैलेंस शीट बिगड़ सकती है।
- शेयर बाजार पर भी असर दिख सकता है।
- निवेशक कंपनियों की अमेरिकी परियोजनाओं पर सवाल उठा सकते हैं।
- भारत सरकार ने इस मामले पर अभी आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।
- लेकिन विदेश मंत्रालय इस पर करीबी नजर रख रहा है।
- भारतीय उद्योग संगठन ने इस फैसले को चिंताजनक बताया है।
- उन्होंने कहा कि इससे भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंध प्रभावित हो सकते हैं।
- नासकॉम जैसे संगठन पहले भी एच-1बी वीजा से जुड़े नियमों में ढील की मांग करते रहे हैं।
- अब वे इस फैसले के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं।
- भारतीय छात्रों के संगठन भी अमेरिकी दूतावास से संपर्क कर सकते हैं।
- यह मुद्दा भारत में भी राजनीतिक रंग ले सकता है।
- विपक्ष सरकार पर दबाव डाल सकता है कि वह अमेरिका से सख्ती से बात करे।
- आने वाले हफ्तों में इस पर बहस तेज होने वाली है।
- ट्रंप का यह फैसला केवल भारतीयों को ही नहीं बल्कि चीन, मैक्सिको और अन्य देशों के पेशेवरों को भी प्रभावित करेगा।
- लेकिन चूंकि एच-1बी वीजा में भारतीयों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है, इसलिए असर भी सबसे बड़ा होगा।
- अमेरिका में भारतीय प्रवासियों की संख्या भी करोड़ों में है।
- उनमें से बड़ी तादाद आईटी और मेडिकल पेशेवरों की है।
- उनकी अगली पीढ़ी भी इस फैसले से प्रभावित होगी।
- कई परिवार जो अमेरिका में बसने का सपना देख रहे थे, उनका सपना अधूरा रह सकता है।
- यह कदम भारतीय समाज में निराशा का माहौल फैला सकता है।
- वहीं अमेरिका में रहने वाले भारतीय भी परेशान हो सकते हैं।
- उन्हें अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को बुलाने में मुश्किलें होंगी।
- कंपनियां भी भारतीय कर्मचारियों पर अतिरिक्त बोझ डाल सकती हैं।
