लोकसभा में बड़ा खुलासा: सड़क धूल नियंत्रण पर ₹7000 करोड़ से अधिक खर्च
लोकसभा में हाल ही में केंद्र सरकार ने बताया कि देशभर के शहरों में सड़क धूल नियंत्रण पर ₹7000 करोड़ से अधिक खर्च किया गया है। पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, यह राशि नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के तहत खर्च की गई, जिसका उद्देश्य शहरी प्रदूषण को कम करना है। सड़कों से उड़ने वाली धूल PM10 स्तर को बढ़ाने का प्रमुख कारण रही है, और इस पर काबू पाने के लिए वाटर स्प्रिंकलर्स, ग्रीन कवरिंग और रोड स्वीपिंग मशीनों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया। एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) सुधारने में यह कदम अहम साबित हुआ, क्योंकि 103 शहरों में PM10 का स्तर घट गया, जबकि 22 शहर राष्ट्रीय मानकों के अंदर आ चुके हैं।
NCAP योजना: सड़क धूल पर फोकस क्यों जरूरी?
NCAP योजना 2019 में शुरू हुई थी, जिसके तहत 131 गैर-प्रदूषित शहरों को चिन्हित किया गया। इसका मुख्य लक्ष्य 2024 तक PM10 और PM2.5 स्तर में 40% कमी लाना था (बाद में 2026 तक संशोधित)। लोकसभा में पर्यावरण राज्य मंत्री किर्ति वर्धन सिंह ने लिखित जवाब में बताया कि सड़क धूल शहरी प्रदूषण का 30-40% हिस्सा है, खासकर दिल्ली, मुंबई, कानपुर जैसे शहरों में। कुल ₹13,852 करोड़ रिलीज किए गए, जिसमें से ₹7,094 करोड़ सड़क धूल नियंत्रण पर उपयोग हुए। दिल्ली में ही ₹500 करोड़ से अधिक खर्च हो चुके हैं, जिससे AQI में सुधार दिखा। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जैसे शहरों में भी यह योजना सक्रिय है, जहां गंगा नदी के किनारे धूल नियंत्रण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
103 शहरों में PM10 स्तर में उल्लेखनीय कमी
लोकसभा डेटा के अनुसार, NCAP के 130 शहरों में से 103 में PM10 स्तर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। 22 शहर, जैसे वाराणसी, आगरा और लखनऊ, राष्ट्रीय मानक (60 माइक्रोग्राम/घन मीटर वार्षिक औसत) के अंदर आ गए। यह उपलब्धि सड़क धूल नियंत्रण की वजह से है, जहां 50,000 से अधिक वाहनों का उपयोग हो रहा। कोविड-19 के बाद धूल प्रदूषण बढ़ा था, लेकिन सरकारी प्रयासों से 20-30% कमी हुई। विस्तृत आंकड़ों में वाराणसी का PM10 स्तर 2020 के 150 से घटकर हाल के वर्षों में काफी कम हुआ, जो स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य के लिए राहत की बात है।
सड़क धूल नियंत्रण के तरीके और चुनौतियां
सरकार ने सड़क धूल कंट्रोल के लिए कई तकनीकी उपाय अपनाए:
- वाटर स्प्रिंकलिंग ट्रक: रोजाना लाखों लीटर पानी का छिड़काव।
- मैकेनिकल रोड स्वीपर्स: दिल्ली-NCR में 1000+ मशीनें तैनात।
- ग्रीन बेल्ट और पेवर ब्लॉक: सड़कों पर पेड़-पौधे और टाइट सतहें।
- कंस्ट्रक्शन साइट मॉनिटरिंग: धूल रोकने के लिए गीली चादरें।
हालांकि चुनौतियां बरकरार हैं। ट्रैफिक जाम, अवैध कंस्ट्रक्शन और मौसमी धूल ने लक्ष्य को प्रभावित किया। विशेषज्ञों का कहना है कि ₹7000 करोड़ पर्याप्त है, लेकिन मॉनिटरिंग मजबूत होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के कारण धूल बढ़ रही, लेकिन NCAP से सुधार उम्मीद है।
भविष्य की योजनाएं: 2026 तक क्या लक्ष्य?
2026 तक NCAP का लक्ष्य सभी शहरों में 50% कमी है।
इसके लिए बजट बढ़ाकर ₹10,000 करोड़ किया जा सकता है।
सांसदों ने सुझाव दिया कि ग्रामीण क्षेत्रों को भी शामिल किया जाए।
वाराणसी जैसे धार्मिक शहरों में टूरिज्म और प्रदूषण बैलेंस जरूरी,
जहां गंगा सफाई के साथ धूल नियंत्रण चले।
यह खुलासा पर्यावरण प्रेमियों के लिए उत्साहजनक है, लेकिन निरंतर प्रयास जरूरी।
एयर क्वालिटी सुधार से कैंसर, अस्थमा जैसी बीमारियां कम होंगी।
